Friday, March 11, 2011

(तुम समझॊ) मॆरॆ जज़्बात

प्रस्तुति: अंकुर शुक्ला

क्यॊ इन्सा होकर रोते हो

इंसानी फितरत को समझो

क्यॊ पाकर सबकुछ खोते हो

इसको नादानी मत समझो



कुछ पाकर खोना भी फन है

कुछ खोकर पाना एक सपना

तुम सपनो को साकार करो

अपने को कमतर मत समझो



इस आशा और निराशा मॆ

है क्या? खॊया है क्या? पाया

मैनॆ तॊ फिर भी कुछ खॊया

तुमनॆ क्या पाया तुम् समझॊ??



वह इन्सा ही कैसा इन्सा

जिसके दिल मे अरमान न हो

अरमान जो पूरे ना हो तो

तन्हा अपने को मत समझो



जब वक़्त दगा दॆ जाता है

हमराज़ यॆ गम हॊ जाता है

अपना तॊ गमॊ सॆ नाता है

इसॆ दॊस्त पुराना तुम समझॊ



कोई वक़्त का मारा बेचारा

कोई वक़्त पकड़कर चलता है

कम्बख़्त ये इन्सा क्या जाने

फितरत जो बदलता रहता है

Saturday, February 12, 2011

धुंधला हुआ समाज का आइना


अंकुर शुक्ला

किसी विद्वान ने कहा है"काजर की कोठरी में कैसो भी सयानो जाए, एक सींक काजर की लागी पय लागी है"

बदलाव का दौर बदस्तूर जारी है.समाज की संरचना, लोगो की जीवन शैली और सोच में बदलाव देखे जा सकते हैं. आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमे परिवर्तन नहीं हुआ हो.मीडिया जगत भी इससे अछूता नहीं है.संचार क्षेत्र में आई क्रान्ति की वजह से देश-विदेश की तमाम खबरें पलक झपकते ही लोगों तक पहुच रही है .ऐसे तमाम परिवर्तनों को सकारात्मक नज़रिए से देखा जाना चाहिए लेकिन इन परिवर्तनों के कुछ दुस्परिणाम भी सामने आ रहे हैं.


समाज का यह महत्वपूर्ण स्तम्भ अपनी जिम्मेदारियों से किनारा कर आज सफल व्यवसाय का रूप ले चुका है.जिसमे समाज को जागृत करने और नई दिशा देने की सोंच कम और लाभ कमाने की इच्छा ज्यादा नजऱ आती है.ऐसे में अपने मूल सिद्धांतों से विमुख हमारे समाज का आइना अपनी पारदर्शिता खो चुका है.जहां एक ओर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए खबरों से ज्यादा महत्व टी.आर.पी.बनाए रखना है और महत्वपूर्ण चुनौती भी.वहीं दूसरी तरफ समाचार पत्र पाठकों को अधिक-से-अधिक आकर्षित करने की होड़ में नए अनुसंधानों के नाम पर सैधांतिक परिवर्तनों को जायज मान रहे हैं.

चाहे न्यूज़ चैनल हो या समाचारपत्र इनके लिए खबरें वही सुर्ख होती है जिससे सनसनी कायम किया जा सके.ऐसे खबरों का समाज पर चाहे जैसा भी असर हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

परिणामस्वरूप हत्या,बलात्कार,अपहरण जैसी आपराधिक घटनाओं को प्रमुखता दी जाने लगा है. कज़ऱ् से बेहाल किसी किसान का आत्महत्या करना,सरकारी तंत्र की उपेक्षा से प्रभावित किसी शहीद सैनिक की विधवा और उसके परिवार की बदतर हालात में होने जैसी खबरों को या तो उचित स्थान नहीं मिलाता है और अगर मिलाता भी है तो बामुश्किल चंद मिनटों का समय या अखबार के किसी कोने का एक कालम.


आज समाज का हर आदमी यह जानता है कि अगर मीडिया को आकर्षित करना है तो आयोजनों या प्रदर्शनों में ग्लैमर या किसी प्रसिद्द व्यक्तित्व कि उपस्थिति का तड़का लगाना एक आसान तरीका है.


आश्चर्य की बात यह है की लोगों की सोंच में काफी दम है और यह धारण भी कि

आज की मीडिया आम आदमी से ज्यादा ख़ास लोगों को तवज्जो देती है.


यह स्थिति मीडिया और आम आदमी के बीच एक अप्रत्याशित अलगाव पैदा कर रहा है.जिससे आम आदमी के बीच मिडिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है. जो सामाजिक दृष्टिकोण से हितकर नहीं है.

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने राजधानी की अलग -अलग जगहों पर नुक्कड़ नाटक, हस्ताक्षर अभियान, शांति मोर्चा जैसे माध्यमो से भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागृति अभियान चलाया था. जिसका कवरेज केवल दूरदर्शन ने किया और दूसरे न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों ने इस खबर को स्थान देना जरूरी नहीं समझा.लेकिन आमिर खान के भतीजे की शादी में शाहरूख खान देर से क्यों आये? क्या देरी की वजह सलमान खान थे ? जैसी आधारहीन खबरों को समय देना ज्यादा सही समझा.जो वर्त्तमान में मीडिया के गैरजिम्मेदाराना रवैये और टी.आर.पी. की भूख को स्पष्ट करता है. टी.आर.पी. व्यवसाइक दृष्टिकोण से जरूरी है लेकिन ऐसे में अपने मूल कर्तव्यों से विमुख होना कहाँ तक उचित है?

समाज का बदलता स्वरुप और लोगों की सोंच में हो रहा परिवर्तन इस बात की ओर इशारा करता है कि आने वाले वक़्त में मीडिया पर सामाजिक जिम्मेदारियों का बोझ और भी बढेगा और इसके साथ लोगों की आशाएं भी.लेकिन जिस तरह समाज के आईने पर वैश्वीकरण रुपी धूल की परत जम चुकी है.उसे साफ कर वापस चमक लाना एक बड़ी चुनौती होगी.वरना कही इस चौथे स्तम्भ का हाल भारतीय राजनीति के जैसी न हो जाये.जिसमे हाथी के दांत खाने के और दिखाने के कुछ और जैसी होकर रह गई है.

Thursday, February 10, 2011

अपनी भूमि पर लोकप्रियता के लिए संघर्षशील “भारतीय शास्त्रीय संगीत”(भाग-2)

लाकारों को हमारे समाज में प्रतिष्ठा एवं प्रसिद्धि प्राप्त है.ज्यादातर कलाकार आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी सबल हैं.अपने व्यक्तिगत या लाभ-पूर्ण मांगों केलिए वह भारत सरकार से निवेदन करते हैं,इन कलाकारों की प्रतिष्ठा,प्रसिद्धि और देश के लिए किये गए उनके योगदान को देखते हुए सरकार चाहकर भी नजरंदाज नही करती है,
तो क्या इस गंभीर सांस्कृतिक संकट के समाधान हेतु ऐसे प्रतिष्ठित कलाकार एकजुट होकर और एक मंच पर आकर आवाज़ उठाएंगे तो क्या? सरकार नींद से नही जागेगी?
rudravina
विदेशों में प्रतिष्ठा और कद्रदानो के नाम पर वहाँ की नागरिकता प्राप्त करने के बजाये अगर, हमारे प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्द कला प्रतिनिधि इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाये तभी स्थिति में सुधार संभव हो पायेगा. इलेक्ट्रोनिक मीडिया और सुचना-क्रांति के युग में क्या कोई ऐसा कलाकार नही है जो,आर्थिक रूप से इतना सबल हो और ऐसे कार्यक्रमों के प्रसारण के लिए एक टी.वी.(उपग्रह) चैनल का आरम्भ करने की कोशिश करे!!अथवा अपना सहयोग दे सके!!
शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में जाने के नाम पर लोग अक्सर यह कहते हैं कि, “इनका कार्यक्रम बहुत लम्बी अवधि का होता है…..हमारे पास समय का बहुत आभाव होता है……हमें इस प्रकार का कार्यक्रम समझ में नही आता है……….ये कार्यक्रम संगीत से सम्बंधित एवं बुज़ुर्ग व्यक्तियों के लिए होता है……… मेरे एक मित्र ने कहा कि ‘ऐसे कार्यक्रम अरूचिकर होते हैं………मुझे पसंद नही आता………चूँकि इसे वृद्ध कलाकार प्रदर्शित करते हैं ,इसलिए ऐसे कार्यक्रम वृद्धों के लिए अच्छा होता है……वगैरह!!वगैरह!!
अरे!! भाई!! जबतक कार्यक्रम में बैठोगे नही,सुनोगे नही तो भला!! इसे सुनने कि रुचि खान उत्पन्न होगी? बिना देखे-सुने केवल दूसरों के मात्र कह्देने से किसी कला के प्रदर्शन पर नकारात्मक और एकतरफा अवधारणा बना लेना कहाँ कि बुद्धिमानी है?? जाकर कार्यक्रम कि प्रस्तुति देखने पर पता चलेगा कि, ऐसे कार्यक्रमों में युवा वर्ग कि उपस्थिति होती है या नही??

हो सकता है! कि आपके मित्र को जो पसंद नही आया वह आपको पसंद हो!

संगीत कला एक कठिन कला है जिसे सीखते हुए इंसान को अपनी उम्र का पता ही नहीं चलता कि वह कब वृद्ध हो गया?वैसे भारतीय शास्त्रीय संगीत में युवा वर्ग से कई प्रसिद्द युवा कलाकार भी हैं.किसी चीज़ को नजदीक से देखने या मह्शूश करने के बाद ही उस पर सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणी करना न्यायोचित रहता है!

हममे से कई लोगों को अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान नही होता फिर भी हम अंग्रेजी भाषा के गानों के धुनों पर थिरकने लगते है!भारतीय शास्त्रीय संगीत तो फिर भी अपने देश कि और अपने ही भाषा में है,जिसमे यकायक तूफ़ान आकर सबकुछ तहस-नहस नही करता बल्कि,धीरे -धीरे सुरों की लहरें आपको कर्णप्रियता और मधुरता के भवर में डुबो कर मनोरंजन की चरम-सीमा तक ले जाती है. विदेशों में या विदेशों से हमारे देश में आये हुए दर्शक जब बिना भाषा ज्ञान के केवल हमारे संगीत की धुन पर थिरक सकते हैं तो हम क्यों नही??

देखा जाए तो उठने से सोने तक हम विदेशियों की नक़ल करने में व्यस्त रहते हैं,तो इन कार्यक्रमों को देखने में भी इन्ही के नक़्शे-कदम पर चलने में भला हर्ज़ ही क्या है??

भारतीय शास्त्रीय संगीत को सुनने से होने वाले फायदों का लोहा विज्ञान और वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है. यहाँ तक कि,भारत और विदेशों में इसकी मदद से कई चिकित्सा-पद्धतियों को भी विकसित किया जा चुका है, जिनकी मदद से आज कई असाध्य रोगों का उपचार संभव हो गया है.

आप वैज्ञानिक युग में जीवन जी रहे हो तो कम से कम विज्ञान को तो मानो!!


इससे पहले कि अँधेरा हो जाए, सूरज बादल में छुप जाये,
चिड़ियों का चहकना रूक जाए, तेरा कोई अपना खो जाए,
तू ही संकट में फंस जाए, विलुप्त कला सब हो जाए,
संगीत के धुन में रम जाओ, आओ सुब मिल मन से गाओ!!

” अगर हम अपनी राष्ट्रिय संस्कृति,धरोहरों और कलाओं का सम्मान नही करेंगे तो हमारी आने वाली पीढियां इसके दर्शन-मात्र को तरस जायेगी और हम सबसे यह सवाल करेगी कि, ‘आप (यानि हम) इतने लापरवाह और गैरजिम्मेदार थे,जो अपने अनमोल सांस्कृतिक धरोहरों को हमारे लिये संभाल न सके??

जरा सोंचिये,क्या ज़बाब देंगे आप उनको और स्वयं को “……………………………???

Saturday, February 5, 2011

अपनी भूमि पर लोकप्रियता के लिए संघर्षशील “भारतीय शास्त्रीय संगीत”(भाग-१)


Presented by : ANKUR SHUKLA

विश्व मानष पटल पर हिन्दुस्तान अपनी बहुआयामी सांस्कृतिक विविधता,धर्मनिरपेक्षता,नम्यता और अनम्यता के अनोखे समिश्रण एवं अपनी कला और प्रतिभाओं के लिए प्रसिद्द है.आज संपूर्ण विश्व भारतीय प्रतिभाओं एवं भारतीय कला का कायल बन चुका है. विज्ञान,दर्शन,संचार,वाणिज्य,व्यवसाय,सूचना एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिन्दुस्तान अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है.

भूमंडलीकरण एवं वैश्वीकरण के प्रभाव से वर्तमान दौड़ में अन्य देशों की तरह भारत प्रभावित हुआ है. जिसके परिणामस्वरुप भारतीय संस्कृति और उससे जुडी जीवनशैली काफी हद तक प्रभावित हुई है.अनेक क्षेत्रों में व्यापक रूप से इसके सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं साथ ही सIथ कई देशों को अपने कुछ क्षेत्रों में व्यापक बदलाव की वजह से इसके दुष्परिणामों से भी रू-ब-रू होना पर रहा है.

भारत में संगीतनृत्य,गायन-वादन की ललित कलाओं के रूप में अपनी एक विशिष्ठ पहचान है.विद्वानों के मतानुसार यह राष्ट्र ‘विश्वस्तर’ पर इन कलाओं प्रतिनिधित्व आदि काल से करता आ रहा है. संगीत को हमारे देश में ‘शास्त्र’ के रूप में जाना जाता है. कलाकारों द्वारा अपने कल्पनाशीलता के माध्यम से हिन्दुस्तानी संगीत का प्रस्तुतीकरण मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है.जानने योग्य बात यह है कि, भारतीय शास्त्रीय संगीत ही एक मात्र ऐसी संगीत है, जिसका आधार कलाकार की कल्पनाशीलता पर निर्भर करता है.विश्व में उपलब्ध अन्य संगीत शैलियाँ एवं उनके प्रस्तुतीकरण का आधार प्रदर्शन से पहले तय किया जाता है.

मगर, “दुःख की बात यह है कि, आज भारतीय शास्त्रीय संगीत हमारे बीच दिन-प्रतिदिन अपनी लोकप्रियता खोती जा रही है.आधुनिक जीवन शैली एवं अन्य देशों कि चकाचौध भरी संस्कृतियों और तरीकों को अपनाने के होड़ में इस विश्व प्रसिद्द कला को समय देने वाले अब नाम मात्र लोग ही सक्रीय दिखते हैं”.हालाँकि,भारतीय शास्त्रीय संगीत के कुछ प्रतिनिधि कलाकार आदि इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं.मगर, यह कहा जाए कि यह सांस्कृतिक धरोहर अपने संकटकालीन दौड़ से गुज़र रही है तो,शायद यह गलत नही होगा. गंभीर सांस्कृतिक संकट से जूझती हमारी यह ललित कला खासकर युवा वर्ग कि उपेक्षा से ग्रस्त है.

गौरतलब है कि, इस सांस्कृतिक धरोहर को संकटकालीन स्थिति से उबारने के लिए देश कि कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा समय-समय पर अनेक प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों से कोई सकारात्मक परिणाम सामने आता हुआ नही दिख रहा है.

जहां एकतरफ हमारे ही देश में हमारी यह सांस्कृतिक विरासत लोकप्रियता के लिए संघर्ष कर रही है, वही विदेशों में हमारी यह अन्मूल कला काफी लोकप्रिय और कर्णप्रिय है.परिणामस्वरूप देश के प्रसिद्द कलाकार उचित मंच के आभाव में अन्य देशों कि ओर बसने को मजबूर हैं.अगर संगीत के विद्यार्थियों के दृष्टिकोण से देखें तो इस विषय में ‘मानक-उपाधि’ प्राप्त छात्र एवं छात्राए रोज़गार के लिए तरश रहे हैं. कुछ प्रतिभाशील कलाकार दिन-प्रतिदिन होती उपेक्षा ओर उचित मंच के आभाव में बदहाली ओर संकटग्रस्त जीवन जीने को या फिर,जीविकोपार्जन हेतु किसी अन्य साधन को अपनाने के लिए मजबूर हैं.

सवाल यह है कि,’ऐसी परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है’ ?
सरकार,कलाकार,अध्यापक या स्वयं हम?देखा जाये तो, इस मामले में सरकार की उदासीनता भी इस गंभीर सांस्कृतिक संकट को बढ़ावा दे रही है जिसके परिणामस्वरूप,केवल यह ललित कला ही नही बल्कि,कई राष्ट्रिय गौरव से जुडी हुई सांस्कृतिक विरासत खतरे में है.वर्तमान में चल रहा ‘हॉकी(राष्ट्रिय खेल) विवाद’ इसका जीवंत उदहारण है.

अक्सर,कलाकार (प्रसिद्द कलाकार) इस बात को लेकर सरकार से असंतुष्ट रहते हैं कि,ललित कलाओं कि बेहतरी के लिए सरकार के द्वारा कोई सहयोग प्राप्त नही होता है.इसके प्रदर्शन हेतु राष्ट्रीय चॅनल पर जो समय निर्धारित किया गया है,उस वक़्त अधिकांश लोग सो गए होते हैं. इन कार्यक्रमों के प्रसारण हेतु जो समय निर्धारित है वह या तो मध्य रात्री में है या फिर! प्रातः काल में.

अब भला दिनभर के व्यस्ततम एवं आपा-धापी भरे जीवन में भला कौन दर्शक होगा जो,इन कार्यक्रमों को देखने या सुनने केलिए आराम से समझौता करेगा!! ऐसे समय निर्धारण से इन मामलों में भारत सरकार कि लापरवाही एवं उदासीनता को स्वयं ही समझा जा सकता है.

अगर शिक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाये तो देश भर के गिने-चुने स्तर के कुछ विश्वविद्यालयों में ही संगीत एवं अन्य ललित कलाओं की शिक्षा दी जाती है,जिन में से अधिकांश विश्वविद्यालयों द्वारा इन विषयों में रोज़गार देना तो दूर की बात है,ऐसे विश्वविद्यालय प्रतिभाशाली कलाकारों के निर्माण में भी अक्षम साबित हो रहे हैं.इन विषयों से जुड़े विद्यार्थी केवल अपनी ‘डिग्री की पिपासा’को शांत करने के लिए इस उम्मीद के कारण प्रवेश लेते हैं कि,इन विषयों से सम्बंधित ‘उपाधि’ होने पर अगर भाग्य ने साथ तो इन्हें व्याख्याता या आखरी उम्मीद के रूप में संगीत शिक्षक बनने का मौका मिल जाएगा.

अन्य क्षेत्रों कि अपेक्षा इन क्षेत्रों आज भी रोज़गार का आभाव है.यह बात अलग है कि जितनी मेहनत विद्यार्थियों को वैज्ञानिक,डॉक्टर,इंजीनियर बनने में करनी होती है, संगीत और ललित कलाओं में भी उतनी ही मेहनत कि जरूरत होती है, या शायद अन्य क्षेत्रों से कही अधिक!! इस लिए ललित कलाओं के क्षेत्र में रोज़गार कि सम्भावना कम होने कि वजह से भला!कौन सा पिता या अभिभावक यह चाहेगा कि उसकी संतान इन क्षेत्रों को अपनाए??
किसी भी विषय कि अच्छी शिक्षा उस विषय के अध्यापक कि ‘विषय-विशेष’ में उसकी निपुणता और उस विषय में उसकी कुशलता पर निर्भर करता है.अनेक संगीत के विद्वानों और प्रसिद्द मंच कलाकारों कि माने तो “एक कलाकार को मंच प्रशिक्षण देने के लिए अद्यापक का स्वयं एक कुशल मंच कलाकार होना आवश्यक होता है”तभी अद्यापक अपने शिष्य को सफल मंच कलाकार बना सकता है.

सोंचने कि बात यह है, कि “अगर अद्यापक स्वयं कला-प्रदर्शन में सक्षम नही है तो,वह किसी विद्यार्थी से मंच-प्रदर्शन योग्य भला कैसे बना सकता है??और संगीत जैसे व्यवहारिक और प्रदर्शन आधारित विषय में वह विद्यार्थी सफलता कैसे प्राप्त करेंगे? अब वही विद्यार्थी अपनी उपाधि के बल पर शिक्षण कार्य करते हुए क्या विद्यार्थियों को संगीत कि उचित शिक्षा देने में सक्षम हो सकते है”? यह अपने आप में एक गंभीर प्रश्न है! ‘विश्वविद्यालयों में ऐसे कितने अद्यापक हैं जो स्वयं मंच एवं कला-प्रदर्शन में सक्षम हैं?इनकी संख्या का स्वयं ही अनुमान लगा लीजिये’!
To be continued............................

Wednesday, February 2, 2011

रैमन मैग्सेसे अवार्ड सरकार को लौटाया

अंकुरशुक्ला

"भारत में सबसे बडे दुख की बात ये है कि कल्याणकारी योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार से भारत की राजनीति चलती है. जो दल सत्ता में है या फिर जो दल सत्ता में आ सकते है वो कभी भी नहीं चाहेंगे कि इस तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कार्रवाई हो" ऐसा कहना है जाने-माने समाज सेवी और रैमन मैग्सेसे अवार्ड विजेता संदीप पांडे का. सरकारी ढुलमुल रवैये और देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार से आहत संदीप ने भारत सरकार से साल २००९ मिले रैमन मैग्सेसे पुरस्कार लौटा दिया है. यह पुरस्कार उन्ह मनरेगा परियोजना के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए दिया गया था जिसमें प्रशस्ति और 44 हज़ार रुपए दिए जाते हैं. इससे पहले गरीब बच्चों के लिए उनके कार्यों को देखते हुए 2002 में रैमन मैग्सेसे अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है.

उन्होंने यह कदम पंचायत स्तर से लेकर केन्द्रीय स्तर तक फैले भ्रष्टाचार और सरकारी कर्मचारियों की दबंगई के विरोध में उठाया है. उन्होंने विशेष तौर पर हरदोई ज़िले के ऐरा काके मउ का उल्लेख करते हुए कहा है कि गांव के ग्राम प्रधान के पति ने पंचायत के छह लाख 20 हज़ार रुपए ले लिए और जब इस बारे में लोगों ने शिकायत की तो पुलिस की मौजूदगी में लोगों को पीटा गया. इस मामले में दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई और वो इससे बेहद दुःखी और निराश हैं.

पांडे का कहना था, ‘‘हमने इस मामले कि शिकायत खंड विकास अधिकारी से लेकर केन्द्र सरकार में ग्रामीण विकास मंत्रालय तक की है लेकिन दो साल हो चुके है आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.बल्कि उल्टा हुआ, जिनके ख़िलाफ़ शिकायत है उन्हें राज्य औऱ केन्द्र सरकार बचाने की कोशिश हो रही है. इसी से क्षुब्ध होकर हम लोगों ने ये पुरस्कार ठुकराने का फैसला किया है.

गौरतलब है कि आम जनता के बीच सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दों को लेकर गहरा असंतोष बना हुआ है. लगातार घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है. ऐसे में देश की जनता के मन में यह सवाल उठाना लाज़मी है की आखिर कौन सी ऐसी मज़बूरी है जिसने भ्रस्ताचारियों के खिलाफ सरकार को ठोस कदम उठाने से रोक रखा है. ?

Tuesday, February 1, 2011

डीटीसी बसों की होंगी अग्निपरीक्षा


अंकुर शुक्ला, नई दिल्ली

राजधानी की सडकों का बादशाह लौट आया है। डीटीसी यानी दिल्ली की आम जनता की सवाड़ी अब अपने रंगत में लौटने को बेताब है। डीटीसी ने यह दावा किया है कि वह लोगों की उम्मीद पर खड़ी उतरेगी। यात्रियों को परेशानी न हो इसके लिए तमाम तैयारियों को अमली जामा पहना दिया गया है। दिल्ली सरकार और डीटीसी ने यह भरोसा दिलाया है की एक फरवरी से डीटीसी की 90 फीसदी से अधिक बसें दिल्ली की सडकों पर उतारी जायेगी साथ ही जिन रूटों से ब्लू लाइन बसे हटाई गई है उन रूटों पर डीटीसी बसे मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी निभाएगी। अगले 15 दिनों तक अत्यधिक व्यस्त रूटों पर और पीक आवर के दौरान डीटीसी के अधिकारियों को मौके पर तैनात रहने का निर्देश दिया गया है ।

डीटीसी के मुताबिक़ 1 फरवरी की सुबह कुल 6200 बसों में से 5500 से अधिक बसें सडकों पर उतारी जायेगी वहीँ शाम को इन बसों की संख्या लगभग 5300 होंगी. रात्री में आखरी ट्रिप को डीटीसी जरूर लगाएगी। इस दौरान कुछ बसों के फेरे भी बढ़ाये जायेंगे। ड्राइवरों और कंडक्टरों की ड्यूटी का समय बढाकर अब 12 घंटे का कर दिया गया है । इन्हें अब 4 घंटे का ओवर टाइम दिया जाएगा । साथ ही इन्हें निर्देश दिया गया है की बसों को सभी बस स्टाप्स पर रोका जाये । ऐसा ने करने पर शख्त कार्रवाई की जायेगी। यह निर्णय परिवहन मंत्री अरविंदर सिंह लवली और डीटीसी अधिकारियों के साथ बैठक में लिया गया है।

गौरतलब है की दिल्ली परिवहन निगम दिल्ली सरकार के महत्वपूर्ण विभागों में से एक है आम जनता के लिए सड़क का सहारा। कुछ साल पहले तक यह सरकार की कमाऊ विभागों में शुमार थी मगर साल 1994 से घाटे का सिलसिला शरू हुआ वह आज-तक बदस्तूर जारी है । लगातार हो रहे घाटे से उबारने के लिए अब तक कई प्रयास किये जा चुके है मगर सभी कोशिशें नाकाफी साबित हो गई।

इस समय दिल्ली परिवहन निगम के पास लगभग 6200 बसों का बेडा है । जिनमे से अबतक बामुश्किल लगभग 4000 बसों को सुबह के वक़्त और शाम को लगभग 3000 बसों को सडकों पर दौडऩा संभव हो पता था। जिनमे से करीब 15000 निर्धारित ट्रिपों को किसी न किसी वज़ह से पूरा नहीं किया जाता था। ऐसे हालत के लिए एक बड़ी वजह ड्राइवरों और कंडक्टरों के आभाव को माना गया है। विभागीय घाटे को बढ़ाने में डीटीसी के ड्राइवरों और कंडक्टरों की भी विशेष भूमिका रही है। अक्सर यात्री यह शिकायत करते हैं कि डीटीसी की बसें स्टापों पर बिना रुके आगे बाद जाती है । यह सिलसिला अबतक जारी है । इसके आलावा ब्लू लाइन के साथ सांठ-गाँठ कर अक्सर मिस्ट्रिपिंग करना अपने रूटों पर देर से आने जैसे कई गंम्भीर आरोप भी डीटीसी पर लगते रहे है।

ज्ञात हो कि इस विभाग की दैनिक आमदनी करीब 40 करोड़ थी.जो ब्लू लाइन बसों के आने के बाद घटकर लगभग 3 करोड़ हो गई है । हर महीने डीटीसी को 80 करोड़ का घाटा सहना पड़ता है । विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार कर्मचारियों के वेतन में 60 करोड़ लोन अदायगी में 12 करोड़ एस्टेब्लिश्मेंट पर 10 करोड़, संचालन सम्बन्धी खर्च 80 करोड़ और दूसरे खर्चो में 10 करोड़ रुपयों का भुगतान करना पड़ता है । ऐसे में यह सवाल उठाना लाज़मी है की लगातार घाटे की मार झेल रही डीटीसी के इस दयनीय हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? आखिर क्या वजह है कि साल 1992 तक लाभ में चल रही दिल्ली सरकार की यह महत्वपूर्ण इकाई अचानक घाटे में चली गई?
पूर्व परिवहन मंत्री जगदीश तैतालर के कार्यकाल में शरू हुई ब्लू लाइन बसों की भविष्य में ऐसी किरकिरी होगी शायद उन्होंने भी यह उम्मीद नहीं की होगी ।
जिस तरह दिल्ली की सडकों पर चल रही ब्लू लाइन बसों ने ताबरतोड़ दुर्घटनाओं को अंजाम दिया और किलर ब्लू लाइन के नाम से बदनाम हो गई.ऐसे में राजधानी की सड़क का इस दूसरे विकल्प को हटाये जाने से आम जनता राहत की सांस जरूर ले रही है । लेकिन दिल्ली परिवहन निगम इससे उपजे आभाव की भरपाई कर पाने में कितना सक्षम हो पाती है कुछ दिनों में खुद ही पता चल जाएगा ।

Sunday, January 30, 2011

निंदा वृति से प्रभावित व्यक्ति देश और दुनिया


प्रस्तुति: अंकुर शुक्ला

इंसान को दूसरे की निंदा और अपनी प्रशंसा बड़ी प्रिय लगती है. देखा जाए तो यह एक सामान्य मानवीय प्रविर्ति है . लेकिन आज के आधुनिक जमाने में एनालिसीस के साए में इंसान के अन्दर आलोचना और निंदा की आदत कब जन्म ले लेती है पता नहीं लगता। प्राय: लोग वैचारिक मतभेद के नाम पर स्वस्थ आलोचना करने के बजाये दूसरों की निंदा करते नहीं थकते हैं. कुछ लोग आलोचक कम और निंदक ज्यादा होते हैं. जिनका एकमात्र उद्देश्य व्यक्ति को नीचा दिखाना होता है. इस प्रवृति का इंसान अपनी आदतों से मजबूर होता है परिणामस्वरूप जहां भी इनकी उपस्थिति होती है वहां का वातावरण तनावपूर्ण बना रहता है. ऐसे लोग किसी के सगे और मित्र नहीं हो सकते.

देखा जाए तो आलोचना और निंदा में बहुत छोटा मगर महत्वपूर्ण फर्क होता है. निंदा का अर्थ है अपने अहंकार का दूसरे के अहंकार से टकराना। जबकि आलोचना का मकसद होता है कहीं न कहीं सत्य को ढूंढना. निंदा की आड़ में कही न कही शत्रुता छिपी होती है जबकि आलोचना के साथ मैत्रीपूर्ण भावना का भी होना संभव है. निंदा में मिटाने का भाव है, आलोचना में जगाने की इच्छा होती है.

निंदा करने की प्रवृति के क्या परिणाम हो सकते हैं और ऐसी प्रवृति का इंसानों को इससे क्या नुकसान हो सकते हैं पवित्र ग्रन्थ रामायण के एक वाकये से समझा जा सकता है. जिसमे मंथरा नामक निंदक प्रवृति की दासी के प्रभाव में आकर रानी कैकई को निंदा का नुकसान उठाना पड़ा था.रामजी के राजतिलक के पूर्व एक ही रात में कैकयी के सामने मंथरा ने जो वार्तालाप आरंभ किया था उसका आरंभ निंदा स्तुति से ही हुआ था। अपनी निंदा वृत्ति को उसने कैकयी में भी प्रवेश करा दिया था। कैकयी के जीवन में निंदा आते ही राम दूर चले गए। निंदा की आदत भगवान को हमसे दूर कर देती है।

आज हमारा देश और यह कहना शायद गलत न होगा कि सम्पूर्ण विश्व इसी निंदा प्रवृति से आहत है.जिसका दुष्प्रभाव धार्मिक कट्टरता, क्षेत्रवाद, नस्लवाद और आतंकवाद आदि के रूप में देखा जा सकता है .

यह कहना गलत नहीं होगा कि इस समय भारतीय राजनीति की जो स्थिति है वह कही न कही निंदा वृति से ही प्रभावित है.जनता की जरूरतों और परेशानियों पर विचार करने के बजाये सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दुसरे की निंदा ही तो कर रहें है.एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़, आरोप-प्रत्यारोपों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. लेकिन क्या इससे देश और जनता को लाभ मिल रहा है?

मुख्य मुद्दे से भटक कर सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार करने में लगे है. कहने का अर्थ यह है कि निंदक प्रवृति से परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता बल्कि असंतोष और शत्रुतापूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती है.सहयोग की भावना ख़त्म हो जाती है और वातावरण तनावपूर्ण बन जाता है.


Saturday, January 29, 2011

सुर ही ईश्वर है: डॉ आदेशरा



  • नेत्र हीनता नही है बाधक क्योंकि संगीत एक एहसास है
  • गरीब छात्रों को शिक्षित कर संतुष्टïी मिलती है



फलता उनकी ही कदम चूमती है जिनमें मंजिल पाने की ललक हो। ऐसे लोगों के इरादे चट्टानों से भी मजबूत होते हंै, जिन्हें उनकेे लक्ष्य से कोई डिगा नही सकता और जिन्हें विजय पाने की आदत हो जाती है। ऐसे लोग प्रत्येक कठिनाइयो को चुनौती मानते हंै और जिंदगी की राह में आत्मविश्वास के साथ उनके बढते कदम असफलता को बहुत पीछे छोड़ देते हंै। ऐसे लोग बन जाते हंै मिसाल समाज के लिए।


उत्तरी दिल्ली के अशोक विहार में रहने वाले सुप्रसिद्व सितार वादक और दिल्ली विश्वविघालय के रि़टायर्ड प्राघ्यापक डा० रवंींद्र आदेशरा उन चन्द लोगों में से एक हंै जिन्होंने कठिनाइयों को चुनौती मान कर उन पर विजय प्राप्त की है। नेत्रहीन होते हुए भी इन्होंने जिंदगी की वो इबारत लिखी है जो समाज के लिए एक बड़ा उदाहरण है और खास तौर से नेत्रहीन लोगों के लिए पे्ररणा का आघार भी ।

अंकुर शुक्ला ने डा० आदेशरा से लंबी बातचीत यहां पेश हंै उसके कुुछ संक्षिप्त अंश

  • आपने सितार वादन ही क्यों अपनाया ïसुना है आप गाते भी है?

* बचपन से ही सितार की आवाज पसंद है और तभी से सितार बजाने की ललक मन मे पैदा हो गई । सितार की आवाज में एक प्रकार की आत्मीयता है जो इसे सजीव बनाता है और यह मन को रोमांचित करने वाला वाद्य यंत्र है। सितार बजाने वाले महान संगीतज्ञो ंको सुनकर सितार बजाने की प्रेरणा मिली ।सितार वादन के साथ गायन में भी रूचि है, वैसे भी संगीत में गायन वादन और नृत्य इन तीनों कलाअंो में से गायन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

  • सितार वादन और कंठ संगीत की विधिवत शिक्षा किन लोगों से प्राप्त की ?

* सितार में विश्वविघालय स्तर पर पी एच डी करने के साथ मुझे गायन और सितार वादन की प्रारंभिक शिक्षा पंडित चंद्रकंात जी, गन्धर्व संगीत महाविघालय के पंडित अनिलधर जी और पद्मविभूषण पंडित देबु चौधरी से प्राप्त करने का सौभाग्य मिला ।
किन चुनौतियों का सामना करना पडा़?

* नेत्रहीनता मेरे लिए एक बडी चुनौती थी नेत्रहीन होने की वजह से सभी अध्यापक यह मानते थे कि मैं सितार नही सीख पाउंगा लेकिन मुझमे इसे सीखने को लेकर ग$जब का आत्मविश्वास और ललक थी । बस मैने अपने आप पर भरोसा किया और सीखने में सफल रहा । इसके अलावा मै तबला और प्राचीन वाद्य यंत्र दिलरूबा इसरारज भी बजाता हूं।

  • आप बदलाव के इस दौर में शास्त्रीय संगीत को कहंा पाते हंै ?

* शास्त्रीय संगीत की अपनी एक खास महत्ता और दर्शक दिर्धा है । संपूर्ण विश्व में शास्त्रीय संगीतही ऐसी संगीत पद्वति है जिसका प्रदर्शन कल्पना पर आधारित होता है । लोगो की रूचि और खास कर युवाओं के पसंद का ख्याल रखा जाना चाहिए। अन्य संगीत पद्वतियों से इसकी तुलना नही की जा सकती ।

  • आपको ऐसा नही लगता कि संगीत के क्षेत्र में कलाकारों के लिए मंच तो उपलब्ध है लेकिन विद्यार्थियों के लिए निश्चित रोजग़ार की कमी है?
* हां यह बात काफी हद तक सही है । इस क्षेत्र में रोजगार की अनिश्चितता तो है मगर स्कूल कालेजों और विश्वविधालयों में अध्यापकों और प्राध्यापकों के रूप में रोजगार प्राप्त की जा सकती है । इसके अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन में भी कलाकरों की नियुक्ति होती है ।

  • बतौर अध्यापक आप अपने को आज कहंा पाते हैं ?

* बतौर संगीत अध्यापक मैेने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षण कार्य को समर्पित कर दिया है विभिन्न विधियों के द्वाारा विद्याथर्र््िायों कों संगीत की शिक्षा देना पसंद है विशेष कर गरीब छात्रों को शिक्षित करना चाहता हँू।
ऐसे लोगो को शिक्षित कर बहुत संतुष्टïी मिलती है इसलिए सेवा निविृत होकर भी मैने यह कार्य जारी रखा है।

  • संगीत के विद्याथर््िायों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेगें?

* विद्यार्थी मेहनत और लगन से अपना लक्ष्य हासिल कर्रंे और अपने गुरूअंो के प्रति आस्था रख्ंो। संगीत के सुर एक छोटे बालक की तरह है जिससें जितना प्यार करोगे सुर तुम्हारे उतना ही करीब होगा।
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एक नजर
  • १९७२ से २००३ दिल्ली विश्वविद्यालय मे बतौर प्राध्यापक
  • वतमान मे अतिथी संकाय केेरूप मे कायॅरत
  • २५ सालो से आकाशवाणी कलाकार
उपलब्धियॉ
  • बेस् त मियुजिसियन अवार्ड
  • म्युजिकएन्ड लायनेन्त अवार्ड
  • नेश्नल कल्चरल सकॉलरशिप
मंच प्रदर्शन
  • मंगलवासरीय संगीत समारोह दिल्ली मुंम्बइ अहमदाबाद सहित भारत के विभिन्न स्थानो मे
  • आकाशवाणी और दूरदर्शन

अमेरिका-चीन के रिश्ते नए स्तर पर


घटनाक्रम पर रहेगी भारत की नजऱ

अंकुर शुक्ला

तेज़ी से आर्थिक प्रगति कर रहे चीन से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा परेशान है। हाल में अमेरिकी दौरे पर गए चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ का व्हाईट हाउस में भव्य स्वागत हुआ । हू ने कहा कि हाल के महीनो में अमेरिका - चीन के रिश्ते नए स्तर पर पहुचें हैं । इस वाक्य का अर्थ निकाले तो यही लगता है कि कुछ महीनो पहले रिश्तों में वो गरमाहट नहीं थी । वहीँ बराक ओबामा ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि यदि चीन शांतिपूर्ण तरीके से तरक्की करता है तो ये अमेरिका के लिए लाभदायक है।

ओबामा के इस वाक्य का निहितार्थ लगाया जाए तो इसका आशय यह निकालता है कि यदि ताइवान के मुद्दे पर आक्रामक रुख न आपनाए और उत्तर कोरिया जैसे देशों को उकसाने और बरगलाने से बाज़ आयें। हालांकि अमेरिका चीन को बढाती ताक़त के रूप में स्वीकार कर चुका है। वैश्विक परिदृश्य में देखा जाए तो अमेरिका अपने हितों के मद्देनजऱ बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।

ओबामा का यह मानना है कि दोनों देशो कि निरंतर प्रगति के लिए बेहतर रिश्ते और सहयोग कायम होना जरूरी है। वहीँ चीन के राष्ट्रपति ने अमेरिका और चीन आपसी सहयोग पर बल देते हुए कई क्षत्रों में आपसी सहयोग की आशा व्यक्त की है जो दोनों देशों की आपसी सहयोग और समर्थन की दिशा में प्रतीक्षित बेचैनी को प्रदर्शित करता है। चीन में मानवाधिकार से सम्बंधित मुद्दे पर अगर ओबामा के बयान पर गौर करें तो यह बात साफ़ पता चलता है कि यह मुद्दा आज भी अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है । इस मुद्दे पर दोनों देश जल्द ही औपचारिक बात-चीत करने वाले हैं.राष्ट्रपति ओबामा के अनुसार इससे चीन को बहुत लाभ होगा।

अमेरिका उन विषयों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता है जिनमे सहमति बनी हुई है, इसको स्वीकारते हुए कि ऐसे कुछ क्षेत्र हैं जिनमे दोनों देशों के बीच मतभेद हैं। कोरियाई प्रायद्वीप में शांति बहाल करने के लिए दोनों नेताओं ने मिलकर काम करने का आश्वासन दिया है। दोनों देशों ने व्यापारिक सहयोग को धयन में रखते हुए 45 अरब डालर के व्यापारिक समझौते पर भी दस्तखत किये हैं जो निश्चित रूप से मिल का पत्थर साबित होगा ।

जिस प्रकार एशिया में चीन और भारत के बीच प्रतिस्प्रधा जारी है उसे देखते हुए भारत की भी नजऱ इस घटनाक्रम पर बनी रहेगी।

Thursday, January 27, 2011

सभी सेवाओं में से 650 नौकरियों में कटौती की जाएगी :बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

*बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के मुताबिक इसकी सभी सेवाओं में से 650 नौकरियों में कटौती की जाएगी


Ankur shukla/Purnima Tiwari

ये फ़ैसला विदेश मंत्रालय से मिलने वाले कुल अनुदान में 16 फ़ीसदी की कमी आने के बाद लिया गया है.

सरकारी फंडिंग में अहम कटौती की वजह से ये परिवर्तन किए जा रहे हैं.हालांकि वर्ल्ड सर्विस की सेवाएँ बरकरार रहेंगी. विश्व भर में फैले अपने स्रोताओं से मिले फीडबैक से हमें मालूम है कि वर्ल्ड सर्विस को दुनिया भर में बेहद सम्मान दिया जाता है इसलिए ये बदलाव लाते हुए हमें दुख हो रहा है.लेकिन फंडिंग की मजबूरियों की वजह से ये परिवर्तन अनिवार्य हो गए थे.

पीटर हॉरॉक्स, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स का कहना है, ''सरकारी फंडिंग में अहम कटौती की वजह से ये परिवर्तन किए जा रहे हैं. हालांकि वर्ल्ड सर्विस की सेवाएँ बरकरार रहेंगी. विश्व भर में फैले अपने स्रोताओं से मिले फीडबैक से हमें मालूम है कि वर्ल्ड सर्विस को दुनिया भर में बेहद सम्मान दिया जाता है इसलिए ये बदलाव लाते हुए हमें दुख हो रहा है.लेकिन फंडिंग की मजबूरियों की वजह से ये परिवर्तन अनिवार्य हो गए थे.''कटौती की घोषणा करते हुए बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स ने बताया कि किन कारणों से ऐसा क़दम उठाया जा रहा है.

हालांकि रूसी भाषा के तीन सबसे मशहूर कार्यक्रम इंटरनेट पर जारी रहेंगे. लेकिन रूसी सेवा में काम करने वाले कुल कर्मचारियों में से आधे कर्मचारियों की नौकरी समाप्त हो जाएगी.

मार्च के अंत तक बीबीसी हिंदी रेडियो के प्रसारण बंद हो जाएंगे. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने भारत में हिंदी भाषा में शॉर्टवेव के जरिए अपनी रेडियो सेवा को बंद करने का फ़ैसला किया है.

कैरिबियाई देशों के लिए अंग्रेज़ी प्रसारण, अफ्ऱीका के लिए पुर्तगाली भाषा में प्रसारण, मैसेडोनियाई और अल्बानियाई और सर्बियाई सेवाएँ बंद कर दी जाएंगी.

इनके अलावा मैडरिन, तुर्की, रूसी, यूक्रेनी, स्पेनिश, अज़ेरी और वियतनामी भाषा के रेडियो प्रसारण बंद हो जाएंगे.

जो शॉर्टवेव प्रसारण बंद होंगे वे हैं- हिंदी, इंडोनिशयाई, स्वाहिली, नेपाली, किर्गिस और ग्रेट लेक्स के इलाक़े में हो रहे प्रसारण.

फ़ारसी भाषा के शाम के रेडियो प्रसारण भी बंद किए जा रहे हैं. साथ ही अंग्रेजी भाषा के कुछ कार्यक्रम भी बंद किए जा रहे हैं.



भारी कटौती

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के इस फ़ैसले के तहत आनेवाले तीन वर्षों में 650 नौकरियां खत्म हो जाएंगी.

ये संख्या वर्ल्ड सर्विस के कुल मौजूदा कर्मचारियों की संख्या की एक चौथाई है.


नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने इन कटौतियों का विरोध किया है

बीबीसी के मुताबिक इस फ़ैसले से वर्ल्ड सर्विस सुननेवाले श्रोताओं की कुल संख्या एक हफ्ते में 18 करोड़ से घटकर 15 करोड़ रह जाएगी यानि श्रोताओं की संख्या में तीन करोड़ की कमी आएगी.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व प्रमुख सर जॉन तूसा के मुताबिक मौजूदा फैसले श्रोताओं, ब्रिटेन की विदेश नीति और खुद वर्ल्ड सर्विस के लिए के लिए बेहद दुखद हैं.

ब्रिटेन की नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने इन घोषणा पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

यूनियन के नेता जर्मी डीयर ने कहा है कि ऐसी प्रसारण सेवा जिस पर ब्रिटेन को गर्व है, उसको नष्ट करने से पत्रकारों और बीबीसी के कर्मचारियों का नाराज़ होना जायज़ है.

ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग इन कटौतियों को उचित ठहराया है.

ब्रितानी संसद में उन्होंने कहा कि वर्ल्ड सर्विस जितना संभव हो उतनी कार्यकुशलता से चलनी चाहिए और उसकी प्राथमिकताएँ नए बाज़ार, ऑनलाइन और मोबाइल बाज़ार हैं