प्रस्तुति: अंकुर शुक्ला Friday, March 11, 2011
(तुम समझॊ) मॆरॆ जज़्बात
प्रस्तुति: अंकुर शुक्ला Saturday, February 12, 2011
धुंधला हुआ समाज का आइना

अंकुर शुक्ला
किसी विद्वान ने कहा है"काजर की कोठरी में कैसो भी सयानो जाए, एक सींक काजर की लागी पय लागी है"
बदलाव का दौर बदस्तूर जारी है.समाज की संरचना, लोगो की जीवन शैली और सोच में बदलाव देखे जा सकते हैं. आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमे परिवर्तन नहीं हुआ हो.मीडिया जगत भी इससे अछूता नहीं है.संचार क्षेत्र में आई क्रान्ति की वजह से देश-विदेश की तमाम खबरें पलक झपकते ही लोगों तक पहुच रही है .ऐसे तमाम परिवर्तनों को सकारात्मक नज़रिए से देखा जाना चाहिए लेकिन इन परिवर्तनों के कुछ दुस्परिणाम भी सामने आ रहे हैं.
समाज का यह महत्वपूर्ण स्तम्भ अपनी जिम्मेदारियों से किनारा कर आज सफल व्यवसाय का रूप ले चुका है.जिसमे समाज को जागृत करने और नई दिशा देने की सोंच कम और लाभ कमाने की इच्छा ज्यादा नजऱ आती है.ऐसे में अपने मूल सिद्धांतों से विमुख हमारे समाज का आइना अपनी पारदर्शिता खो चुका है.जहां एक ओर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए खबरों से ज्यादा महत्व टी.आर.पी.बनाए रखना है और महत्वपूर्ण चुनौती भी.वहीं दूसरी तरफ समाचार पत्र पाठकों को अधिक-से-अधिक आकर्षित करने की होड़ में नए अनुसंधानों के नाम पर सैधांतिक परिवर्तनों को जायज मान रहे हैं.
चाहे न्यूज़ चैनल हो या समाचारपत्र इनके लिए खबरें वही सुर्ख होती है जिससे सनसनी कायम किया जा सके.ऐसे खबरों का समाज पर चाहे जैसा भी असर हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
परिणामस्वरूप हत्या,बलात्कार,अपहरण जैसी आपराधिक घटनाओं को प्रमुखता दी जाने लगा है. कज़ऱ् से बेहाल किसी किसान का आत्महत्या करना,सरकारी तंत्र की उपेक्षा से प्रभावित किसी शहीद सैनिक की विधवा और उसके परिवार की बदतर हालात में होने जैसी खबरों को या तो उचित स्थान नहीं मिलाता है और अगर मिलाता भी है तो बामुश्किल चंद मिनटों का समय या अखबार के किसी कोने का एक कालम.
आज समाज का हर आदमी यह जानता है कि अगर मीडिया को आकर्षित करना है तो आयोजनों या प्रदर्शनों में ग्लैमर या किसी प्रसिद्द व्यक्तित्व कि उपस्थिति का तड़का लगाना एक आसान तरीका है.
आश्चर्य की बात यह है की लोगों की सोंच में काफी दम है और यह धारण भी कि
आज की मीडिया आम आदमी से ज्यादा ख़ास लोगों को तवज्जो देती है.
यह स्थिति मीडिया और आम आदमी के बीच एक अप्रत्याशित अलगाव पैदा कर रहा है.जिससे आम आदमी के बीच मिडिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है. जो सामाजिक दृष्टिकोण से हितकर नहीं है.
पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने राजधानी की अलग -अलग जगहों पर नुक्कड़ नाटक, हस्ताक्षर अभियान, शांति मोर्चा जैसे माध्यमो से भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागृति अभियान चलाया था. जिसका कवरेज केवल दूरदर्शन ने किया और दूसरे न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों ने इस खबर को स्थान देना जरूरी नहीं समझा.लेकिन आमिर खान के भतीजे की शादी में शाहरूख खान देर से क्यों आये? क्या देरी की वजह सलमान खान थे ? जैसी आधारहीन खबरों को समय देना ज्यादा सही समझा.जो वर्त्तमान में मीडिया के गैरजिम्मेदाराना रवैये और टी.आर.पी. की भूख को स्पष्ट करता है. टी.आर.पी. व्यवसाइक दृष्टिकोण से जरूरी है लेकिन ऐसे में अपने मूल कर्तव्यों से विमुख होना कहाँ तक उचित है?
समाज का बदलता स्वरुप और लोगों की सोंच में हो रहा परिवर्तन इस बात की ओर इशारा करता है कि आने वाले वक़्त में मीडिया पर सामाजिक जिम्मेदारियों का बोझ और भी बढेगा और इसके साथ लोगों की आशाएं भी.लेकिन जिस तरह समाज के आईने पर वैश्वीकरण रुपी धूल की परत जम चुकी है.उसे साफ कर वापस चमक लाना एक बड़ी चुनौती होगी.वरना कही इस चौथे स्तम्भ का हाल भारतीय राजनीति के जैसी न हो जाये.जिसमे हाथी के दांत खाने के और दिखाने के कुछ और जैसी होकर रह गई है.
Thursday, February 10, 2011
अपनी भूमि पर लोकप्रियता के लिए संघर्षशील “भारतीय शास्त्रीय संगीत”(भाग-2)
Saturday, February 5, 2011
अपनी भूमि पर लोकप्रियता के लिए संघर्षशील “भारतीय शास्त्रीय संगीत”(भाग-१)
Wednesday, February 2, 2011
रैमन मैग्सेसे अवार्ड सरकार को लौटाया

अंकुरशुक्ला
"भारत में सबसे बडे दुख की बात ये है कि कल्याणकारी योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार से भारत की राजनीति चलती है. जो दल सत्ता में है या फिर जो दल सत्ता में आ सकते है वो कभी भी नहीं चाहेंगे कि इस तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कार्रवाई हो" ऐसा कहना है जाने-माने समाज सेवी और रैमन मैग्सेसे अवार्ड विजेता संदीप पांडे का. सरकारी ढुलमुल रवैये और देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार से आहत संदीप ने भारत सरकार से साल २००९ मिले रैमन मैग्सेसे पुरस्कार लौटा दिया है. यह पुरस्कार उन्ह मनरेगा परियोजना के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए दिया गया था जिसमें प्रशस्ति और 44 हज़ार रुपए दिए जाते हैं. इससे पहले गरीब बच्चों के लिए उनके कार्यों को देखते हुए 2002 में रैमन मैग्सेसे अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है.
Tuesday, February 1, 2011
डीटीसी बसों की होंगी अग्निपरीक्षा

Sunday, January 30, 2011
निंदा वृति से प्रभावित व्यक्ति देश और दुनिया

प्रस्तुति: अंकुर शुक्ला
इंसान को दूसरे की निंदा और अपनी प्रशंसा बड़ी प्रिय लगती है. देखा जाए तो यह एक सामान्य मानवीय प्रविर्ति है . लेकिन आज के आधुनिक जमाने में एनालिसीस के साए में इंसान के अन्दर आलोचना और निंदा की आदत कब जन्म ले लेती है पता नहीं लगता। प्राय: लोग वैचारिक मतभेद के नाम पर स्वस्थ आलोचना करने के बजाये दूसरों की निंदा करते नहीं थकते हैं. कुछ लोग आलोचक कम और निंदक ज्यादा होते हैं. जिनका एकमात्र उद्देश्य व्यक्ति को नीचा दिखाना होता है. इस प्रवृति का इंसान अपनी आदतों से मजबूर होता है परिणामस्वरूप जहां भी इनकी उपस्थिति होती है वहां का वातावरण तनावपूर्ण बना रहता है. ऐसे लोग किसी के सगे और मित्र नहीं हो सकते.
देखा जाए तो आलोचना और निंदा में बहुत छोटा मगर महत्वपूर्ण फर्क होता है. निंदा का अर्थ है अपने अहंकार का दूसरे के अहंकार से टकराना। जबकि आलोचना का मकसद होता है कहीं न कहीं सत्य को ढूंढना. निंदा की आड़ में कही न कही शत्रुता छिपी होती है जबकि आलोचना के साथ मैत्रीपूर्ण भावना का भी होना संभव है. निंदा में मिटाने का भाव है, आलोचना में जगाने की इच्छा होती है.
निंदा करने की प्रवृति के क्या परिणाम हो सकते हैं और ऐसी प्रवृति का इंसानों को इससे क्या नुकसान हो सकते हैं पवित्र ग्रन्थ रामायण के एक वाकये से समझा जा सकता है. जिसमे मंथरा नामक निंदक प्रवृति की दासी के प्रभाव में आकर रानी कैकई को निंदा का नुकसान उठाना पड़ा था.रामजी के राजतिलक के पूर्व एक ही रात में कैकयी के सामने मंथरा ने जो वार्तालाप आरंभ किया था उसका आरंभ निंदा स्तुति से ही हुआ था। अपनी निंदा वृत्ति को उसने कैकयी में भी प्रवेश करा दिया था। कैकयी के जीवन में निंदा आते ही राम दूर चले गए। निंदा की आदत भगवान को हमसे दूर कर देती है।
आज हमारा देश और यह कहना शायद गलत न होगा कि सम्पूर्ण विश्व इसी निंदा प्रवृति से आहत है.जिसका दुष्प्रभाव धार्मिक कट्टरता, क्षेत्रवाद, नस्लवाद और आतंकवाद आदि के रूप में देखा जा सकता है .
यह कहना गलत नहीं होगा कि इस समय भारतीय राजनीति की जो स्थिति है वह कही न कही निंदा वृति से ही प्रभावित है.जनता की जरूरतों और परेशानियों पर विचार करने के बजाये सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दुसरे की निंदा ही तो कर रहें है.एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़, आरोप-प्रत्यारोपों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. लेकिन क्या इससे देश और जनता को लाभ मिल रहा है?
मुख्य मुद्दे से भटक कर सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार करने में लगे है. कहने का अर्थ यह है कि निंदक प्रवृति से परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता बल्कि असंतोष और शत्रुतापूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती है.सहयोग की भावना ख़त्म हो जाती है और वातावरण तनावपूर्ण बन जाता है.
Saturday, January 29, 2011
सुर ही ईश्वर है: डॉ आदेशरा
- नेत्र हीनता नही है बाधक क्योंकि संगीत एक एहसास है
- गरीब छात्रों को शिक्षित कर संतुष्टïी मिलती है
- आपने सितार वादन ही क्यों अपनाया ïसुना है आप गाते भी है?
- सितार वादन और कंठ संगीत की विधिवत शिक्षा किन लोगों से प्राप्त की ?
- आप बदलाव के इस दौर में शास्त्रीय संगीत को कहंा पाते हंै ?
- आपको ऐसा नही लगता कि संगीत के क्षेत्र में कलाकारों के लिए मंच तो उपलब्ध है लेकिन विद्यार्थियों के लिए निश्चित रोजग़ार की कमी है?
- बतौर अध्यापक आप अपने को आज कहंा पाते हैं ?
- संगीत के विद्याथर््िायों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेगें?
- १९७२ से २००३ दिल्ली विश्वविद्यालय मे बतौर प्राध्यापक
- वतमान मे अतिथी संकाय केेरूप मे कायॅरत
- २५ सालो से आकाशवाणी कलाकार
- बेस् त मियुजिसियन अवार्ड
- म्युजिकएन्ड लायनेन्त अवार्ड
- नेश्नल कल्चरल सकॉलरशिप
- मंगलवासरीय संगीत समारोह दिल्ली मुंम्बइ अहमदाबाद सहित भारत के विभिन्न स्थानो मे
- आकाशवाणी और दूरदर्शन
अमेरिका-चीन के रिश्ते नए स्तर पर

Thursday, January 27, 2011
सभी सेवाओं में से 650 नौकरियों में कटौती की जाएगी :बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
सरकारी फंडिंग में अहम कटौती की वजह से ये परिवर्तन किए जा रहे हैं.हालांकि वर्ल्ड सर्विस की सेवाएँ बरकरार रहेंगी. विश्व भर में फैले अपने स्रोताओं से मिले फीडबैक से हमें मालूम है कि वर्ल्ड सर्विस को दुनिया भर में बेहद सम्मान दिया जाता है इसलिए ये बदलाव लाते हुए हमें दुख हो रहा है.लेकिन फंडिंग की मजबूरियों की वजह से ये परिवर्तन अनिवार्य हो गए थे.
पीटर हॉरॉक्स, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स का कहना है, ''सरकारी फंडिंग में अहम कटौती की वजह से ये परिवर्तन किए जा रहे हैं. हालांकि वर्ल्ड सर्विस की सेवाएँ बरकरार रहेंगी. विश्व भर में फैले अपने स्रोताओं से मिले फीडबैक से हमें मालूम है कि वर्ल्ड सर्विस को दुनिया भर में बेहद सम्मान दिया जाता है इसलिए ये बदलाव लाते हुए हमें दुख हो रहा है.लेकिन फंडिंग की मजबूरियों की वजह से ये परिवर्तन अनिवार्य हो गए थे.''कटौती की घोषणा करते हुए बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स ने बताया कि किन कारणों से ऐसा क़दम उठाया जा रहा है.
हालांकि रूसी भाषा के तीन सबसे मशहूर कार्यक्रम इंटरनेट पर जारी रहेंगे. लेकिन रूसी सेवा में काम करने वाले कुल कर्मचारियों में से आधे कर्मचारियों की नौकरी समाप्त हो जाएगी.
मार्च के अंत तक बीबीसी हिंदी रेडियो के प्रसारण बंद हो जाएंगे. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने भारत में हिंदी भाषा में शॉर्टवेव के जरिए अपनी रेडियो सेवा को बंद करने का फ़ैसला किया है.
कैरिबियाई देशों के लिए अंग्रेज़ी प्रसारण, अफ्ऱीका के लिए पुर्तगाली भाषा में प्रसारण, मैसेडोनियाई और अल्बानियाई और सर्बियाई सेवाएँ बंद कर दी जाएंगी.
इनके अलावा मैडरिन, तुर्की, रूसी, यूक्रेनी, स्पेनिश, अज़ेरी और वियतनामी भाषा के रेडियो प्रसारण बंद हो जाएंगे.
जो शॉर्टवेव प्रसारण बंद होंगे वे हैं- हिंदी, इंडोनिशयाई, स्वाहिली, नेपाली, किर्गिस और ग्रेट लेक्स के इलाक़े में हो रहे प्रसारण.
फ़ारसी भाषा के शाम के रेडियो प्रसारण भी बंद किए जा रहे हैं. साथ ही अंग्रेजी भाषा के कुछ कार्यक्रम भी बंद किए जा रहे हैं.
भारी कटौती
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के इस फ़ैसले के तहत आनेवाले तीन वर्षों में 650 नौकरियां खत्म हो जाएंगी.
ये संख्या वर्ल्ड सर्विस के कुल मौजूदा कर्मचारियों की संख्या की एक चौथाई है.
नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने इन कटौतियों का विरोध किया है
बीबीसी के मुताबिक इस फ़ैसले से वर्ल्ड सर्विस सुननेवाले श्रोताओं की कुल संख्या एक हफ्ते में 18 करोड़ से घटकर 15 करोड़ रह जाएगी यानि श्रोताओं की संख्या में तीन करोड़ की कमी आएगी.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व प्रमुख सर जॉन तूसा के मुताबिक मौजूदा फैसले श्रोताओं, ब्रिटेन की विदेश नीति और खुद वर्ल्ड सर्विस के लिए के लिए बेहद दुखद हैं.
ब्रिटेन की नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने इन घोषणा पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.
यूनियन के नेता जर्मी डीयर ने कहा है कि ऐसी प्रसारण सेवा जिस पर ब्रिटेन को गर्व है, उसको नष्ट करने से पत्रकारों और बीबीसी के कर्मचारियों का नाराज़ होना जायज़ है.
ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग इन कटौतियों को उचित ठहराया है.
ब्रितानी संसद में उन्होंने कहा कि वर्ल्ड सर्विस जितना संभव हो उतनी कार्यकुशलता से चलनी चाहिए और उसकी प्राथमिकताएँ नए बाज़ार, ऑनलाइन और मोबाइल बाज़ार हैं