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Sunday, March 13, 2011

"मीडिया को अपने गिरेबान में झाकने की जरूरत" : प्रभु चावला





  • सन्डे इंडियन और टाइम्स फाउन्डेसन का राष्ट्रीय मीडिया सेमिनार
अंकुर शुक्ला, नई दिल्ली (12 मार्च )

जनवाणी से दूर होती मीडिया और उसकी जबावदेही पर सन्डे इंडियन और टाइम्स फाउन्डेसन ने संयुक्त रूप से शनिवार को कमानी सभागार में सेमिनार का आयोजन किया । इस मौके पर कई जाने - माने पत्रकार मौजूद थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्रा ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत में मैनजमेंट गुरु प्रो.अरिंदम चौधरी ने मीडिया पर कई सवाल उठाते हुए कहा कि आज की मीडिया कोई बड़ा बदलाव करने में यकीन नहीं रखती और इस देश में गरीबों के लिए न्याय की बात सोचना दिन में सपने देखने जैसा है. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए देश की मीडिया और न्यायपालिका को एकजुट होकर अपनी भूमिका निभानी होगी.

वरिष्ट पत्रकार प्रभु चावला ने मीडिया को अपने गिरेबान में झाकने की सलाह देते हुए कहा कि आज की मीडिया अपने विचार देना तो जानती है लेकिन जनता से जुड़े सवालों को पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाती है. उनके सवाल उनके सिद्धांतों के
विपरीत और प्रायोजित होते हैं. ऐसी परिस्थितियों से जल्द ही निपटने की जरूरत है.

वरिष्ट पत्रकार राहुल देव ने मीडिया को बाज़ार का हिस्सा बताते हुए कहा कि हमारी लाइफ स्टाइल काफी हद तक मीडिया पर निर्भर है.यह हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है और परिस्थितियों में हो रहे परिवर्तन से इसके अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है.

एक टीवी चैनल के प्रबंध सम्पादक आशुतोष ने खबरिया चैनलों की लापरवाह और तर्कहीन कार्यक्रमों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि हमें खुद से यह सवाल करना होगा कि क्या हम ईमानदार हैं? हमें दूसरों को बेईमान कहने का क्या अधिकार है?

लोकप्रिय पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में सरकारी नीतियों और समस्याओ का हवाला दिया और कई महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि पूरा सिस्टम लाभ के लिए काम कर रहा है जिसमे मीडिया भी उसमे शामिल है. आज का मीडिया गूगल के कंटेंट पर ज्यादा निर्भर हो गया है.जिसके कारण मास और मीडिया में संवादहीनता जैसी स्थिति बन गई है. हमें लोगों तक पहुचकर उनकी समस्याओं को जानना चाहिए.

अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय ने कहा कि" न्यूज़ चैनलों पर चल रहे शीला मुन्नी और जादू -टोने जैसे निम्नस्तरीय कार्यक्रमों को दिखाकर हम क्या साबित करना चाहते हैं"? क्या मीडिया की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह शिक्षा परक कार्यक्रमों में भी अपनी भूमिका का अहसास कराए.लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया ने खुद ही अपने आप को चौथे महत्वपूर्ण स्तम्भ के रूप में घोषित कर दिया है वास्तव में आज भी तीन स्तम्भ ही महत्वपूर्ण हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ एक वाक्य बोलकर "हमें कोई रोक नहीं सकता" उन्होंने अमेरिका में इतिहास कायम कर दिया. क्योंकि वहां की जनता का भरोसा उन्होंने अपने संवाद से जीत लिया. हमें पहले जनता का भरोसा जीतना होगा और इसके लिए हमें उनके बीच जाकर उनकी आवाज़ बनना होगा.

दूरदर्शन के चीफ प्रोड्यूसर कुबेर दत्त ने जनवाणी के शुरू होने और कार्यक्रम से सम्बंधित अपने संघर्ष और चुनौतियों की विस्तार से चर्चा की. गौरतलब है कि कुबेर दत्त दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले लोकप्रिय कार्यक्रम 'जनवाणी' के प्रोड्यूसर भी रह चुके हैं. उनके अनुसार विभागीय लापरवाहियों का ठीकरा उनके सिर डालकर उन्हें साजिश के तहत निलंबित भी किया गया था.

स्तंभकार ज़फर आगा ने कहा कि मीडिया की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती. परिस्थितियों के विपरीत होने पर उसने अपना रास्ता खुद ही तय किया है. उन्होंने ध्यान दिलाते हुए कहा कि मौजूदा दौर में फेसबुक,ट्विटर और ब्लॉग के रूप में उभरती तमाम वैकल्पिक मीडिया इस बात के प्रमाण हैं.

बी ई ए के महासचिव और साधना न्यूज़ के चैनल हेड एन के सिंह ने दर्शकों से जिम्मेदार बनाने की अपील की और कहा की न्यूज़ चैनलों द्वारा दिखाए जा रहे बेतुके और आधारहीन कार्यक्रमों की आड़ में सरकार नियंत्रण समीति के गठन का प्रयास कर रही है.जिसका नियंत्रण कही न कही सरकार अपने पास रखना चाहती है.जो मीडिया की स्वतंत्रता के लिए हितकर नहीं होगा. ऐसे कार्यक्रमों को प्रसारित करने वाले न्यूज़ चैनलों से उन्होंने गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत पर बल दिया.

सेमिनार को वर्तिका नंदा , मुकेश कुमार , कुर्बान अली , संजय अहिरवाल आदि पत्रकारों ने भी संबोधित किया.
इस मौके पर टाइम्स फाउन्डेसन के निदेशक पूरण चंद पांडे भी मौजूद थे. वही जाने-माने पत्रकार ओंकारेश्वर पांडे ने बड़े ही रोचक अंदाज़ में सेमिनार का संचालन और उद्घोषणा की.




Wednesday, February 2, 2011

रैमन मैग्सेसे अवार्ड सरकार को लौटाया

अंकुरशुक्ला

"भारत में सबसे बडे दुख की बात ये है कि कल्याणकारी योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार से भारत की राजनीति चलती है. जो दल सत्ता में है या फिर जो दल सत्ता में आ सकते है वो कभी भी नहीं चाहेंगे कि इस तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कार्रवाई हो" ऐसा कहना है जाने-माने समाज सेवी और रैमन मैग्सेसे अवार्ड विजेता संदीप पांडे का. सरकारी ढुलमुल रवैये और देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार से आहत संदीप ने भारत सरकार से साल २००९ मिले रैमन मैग्सेसे पुरस्कार लौटा दिया है. यह पुरस्कार उन्ह मनरेगा परियोजना के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए दिया गया था जिसमें प्रशस्ति और 44 हज़ार रुपए दिए जाते हैं. इससे पहले गरीब बच्चों के लिए उनके कार्यों को देखते हुए 2002 में रैमन मैग्सेसे अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है.

उन्होंने यह कदम पंचायत स्तर से लेकर केन्द्रीय स्तर तक फैले भ्रष्टाचार और सरकारी कर्मचारियों की दबंगई के विरोध में उठाया है. उन्होंने विशेष तौर पर हरदोई ज़िले के ऐरा काके मउ का उल्लेख करते हुए कहा है कि गांव के ग्राम प्रधान के पति ने पंचायत के छह लाख 20 हज़ार रुपए ले लिए और जब इस बारे में लोगों ने शिकायत की तो पुलिस की मौजूदगी में लोगों को पीटा गया. इस मामले में दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई और वो इससे बेहद दुःखी और निराश हैं.

पांडे का कहना था, ‘‘हमने इस मामले कि शिकायत खंड विकास अधिकारी से लेकर केन्द्र सरकार में ग्रामीण विकास मंत्रालय तक की है लेकिन दो साल हो चुके है आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.बल्कि उल्टा हुआ, जिनके ख़िलाफ़ शिकायत है उन्हें राज्य औऱ केन्द्र सरकार बचाने की कोशिश हो रही है. इसी से क्षुब्ध होकर हम लोगों ने ये पुरस्कार ठुकराने का फैसला किया है.

गौरतलब है कि आम जनता के बीच सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दों को लेकर गहरा असंतोष बना हुआ है. लगातार घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है. ऐसे में देश की जनता के मन में यह सवाल उठाना लाज़मी है की आखिर कौन सी ऐसी मज़बूरी है जिसने भ्रस्ताचारियों के खिलाफ सरकार को ठोस कदम उठाने से रोक रखा है. ?

Tuesday, February 1, 2011

डीटीसी बसों की होंगी अग्निपरीक्षा


अंकुर शुक्ला, नई दिल्ली

राजधानी की सडकों का बादशाह लौट आया है। डीटीसी यानी दिल्ली की आम जनता की सवाड़ी अब अपने रंगत में लौटने को बेताब है। डीटीसी ने यह दावा किया है कि वह लोगों की उम्मीद पर खड़ी उतरेगी। यात्रियों को परेशानी न हो इसके लिए तमाम तैयारियों को अमली जामा पहना दिया गया है। दिल्ली सरकार और डीटीसी ने यह भरोसा दिलाया है की एक फरवरी से डीटीसी की 90 फीसदी से अधिक बसें दिल्ली की सडकों पर उतारी जायेगी साथ ही जिन रूटों से ब्लू लाइन बसे हटाई गई है उन रूटों पर डीटीसी बसे मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी निभाएगी। अगले 15 दिनों तक अत्यधिक व्यस्त रूटों पर और पीक आवर के दौरान डीटीसी के अधिकारियों को मौके पर तैनात रहने का निर्देश दिया गया है ।

डीटीसी के मुताबिक़ 1 फरवरी की सुबह कुल 6200 बसों में से 5500 से अधिक बसें सडकों पर उतारी जायेगी वहीँ शाम को इन बसों की संख्या लगभग 5300 होंगी. रात्री में आखरी ट्रिप को डीटीसी जरूर लगाएगी। इस दौरान कुछ बसों के फेरे भी बढ़ाये जायेंगे। ड्राइवरों और कंडक्टरों की ड्यूटी का समय बढाकर अब 12 घंटे का कर दिया गया है । इन्हें अब 4 घंटे का ओवर टाइम दिया जाएगा । साथ ही इन्हें निर्देश दिया गया है की बसों को सभी बस स्टाप्स पर रोका जाये । ऐसा ने करने पर शख्त कार्रवाई की जायेगी। यह निर्णय परिवहन मंत्री अरविंदर सिंह लवली और डीटीसी अधिकारियों के साथ बैठक में लिया गया है।

गौरतलब है की दिल्ली परिवहन निगम दिल्ली सरकार के महत्वपूर्ण विभागों में से एक है आम जनता के लिए सड़क का सहारा। कुछ साल पहले तक यह सरकार की कमाऊ विभागों में शुमार थी मगर साल 1994 से घाटे का सिलसिला शरू हुआ वह आज-तक बदस्तूर जारी है । लगातार हो रहे घाटे से उबारने के लिए अब तक कई प्रयास किये जा चुके है मगर सभी कोशिशें नाकाफी साबित हो गई।

इस समय दिल्ली परिवहन निगम के पास लगभग 6200 बसों का बेडा है । जिनमे से अबतक बामुश्किल लगभग 4000 बसों को सुबह के वक़्त और शाम को लगभग 3000 बसों को सडकों पर दौडऩा संभव हो पता था। जिनमे से करीब 15000 निर्धारित ट्रिपों को किसी न किसी वज़ह से पूरा नहीं किया जाता था। ऐसे हालत के लिए एक बड़ी वजह ड्राइवरों और कंडक्टरों के आभाव को माना गया है। विभागीय घाटे को बढ़ाने में डीटीसी के ड्राइवरों और कंडक्टरों की भी विशेष भूमिका रही है। अक्सर यात्री यह शिकायत करते हैं कि डीटीसी की बसें स्टापों पर बिना रुके आगे बाद जाती है । यह सिलसिला अबतक जारी है । इसके आलावा ब्लू लाइन के साथ सांठ-गाँठ कर अक्सर मिस्ट्रिपिंग करना अपने रूटों पर देर से आने जैसे कई गंम्भीर आरोप भी डीटीसी पर लगते रहे है।

ज्ञात हो कि इस विभाग की दैनिक आमदनी करीब 40 करोड़ थी.जो ब्लू लाइन बसों के आने के बाद घटकर लगभग 3 करोड़ हो गई है । हर महीने डीटीसी को 80 करोड़ का घाटा सहना पड़ता है । विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार कर्मचारियों के वेतन में 60 करोड़ लोन अदायगी में 12 करोड़ एस्टेब्लिश्मेंट पर 10 करोड़, संचालन सम्बन्धी खर्च 80 करोड़ और दूसरे खर्चो में 10 करोड़ रुपयों का भुगतान करना पड़ता है । ऐसे में यह सवाल उठाना लाज़मी है की लगातार घाटे की मार झेल रही डीटीसी के इस दयनीय हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? आखिर क्या वजह है कि साल 1992 तक लाभ में चल रही दिल्ली सरकार की यह महत्वपूर्ण इकाई अचानक घाटे में चली गई?
पूर्व परिवहन मंत्री जगदीश तैतालर के कार्यकाल में शरू हुई ब्लू लाइन बसों की भविष्य में ऐसी किरकिरी होगी शायद उन्होंने भी यह उम्मीद नहीं की होगी ।
जिस तरह दिल्ली की सडकों पर चल रही ब्लू लाइन बसों ने ताबरतोड़ दुर्घटनाओं को अंजाम दिया और किलर ब्लू लाइन के नाम से बदनाम हो गई.ऐसे में राजधानी की सड़क का इस दूसरे विकल्प को हटाये जाने से आम जनता राहत की सांस जरूर ले रही है । लेकिन दिल्ली परिवहन निगम इससे उपजे आभाव की भरपाई कर पाने में कितना सक्षम हो पाती है कुछ दिनों में खुद ही पता चल जाएगा ।

Thursday, January 27, 2011

सभी सेवाओं में से 650 नौकरियों में कटौती की जाएगी :बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

*बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के मुताबिक इसकी सभी सेवाओं में से 650 नौकरियों में कटौती की जाएगी


Ankur shukla/Purnima Tiwari

ये फ़ैसला विदेश मंत्रालय से मिलने वाले कुल अनुदान में 16 फ़ीसदी की कमी आने के बाद लिया गया है.

सरकारी फंडिंग में अहम कटौती की वजह से ये परिवर्तन किए जा रहे हैं.हालांकि वर्ल्ड सर्विस की सेवाएँ बरकरार रहेंगी. विश्व भर में फैले अपने स्रोताओं से मिले फीडबैक से हमें मालूम है कि वर्ल्ड सर्विस को दुनिया भर में बेहद सम्मान दिया जाता है इसलिए ये बदलाव लाते हुए हमें दुख हो रहा है.लेकिन फंडिंग की मजबूरियों की वजह से ये परिवर्तन अनिवार्य हो गए थे.

पीटर हॉरॉक्स, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स का कहना है, ''सरकारी फंडिंग में अहम कटौती की वजह से ये परिवर्तन किए जा रहे हैं. हालांकि वर्ल्ड सर्विस की सेवाएँ बरकरार रहेंगी. विश्व भर में फैले अपने स्रोताओं से मिले फीडबैक से हमें मालूम है कि वर्ल्ड सर्विस को दुनिया भर में बेहद सम्मान दिया जाता है इसलिए ये बदलाव लाते हुए हमें दुख हो रहा है.लेकिन फंडिंग की मजबूरियों की वजह से ये परिवर्तन अनिवार्य हो गए थे.''कटौती की घोषणा करते हुए बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स ने बताया कि किन कारणों से ऐसा क़दम उठाया जा रहा है.

हालांकि रूसी भाषा के तीन सबसे मशहूर कार्यक्रम इंटरनेट पर जारी रहेंगे. लेकिन रूसी सेवा में काम करने वाले कुल कर्मचारियों में से आधे कर्मचारियों की नौकरी समाप्त हो जाएगी.

मार्च के अंत तक बीबीसी हिंदी रेडियो के प्रसारण बंद हो जाएंगे. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने भारत में हिंदी भाषा में शॉर्टवेव के जरिए अपनी रेडियो सेवा को बंद करने का फ़ैसला किया है.

कैरिबियाई देशों के लिए अंग्रेज़ी प्रसारण, अफ्ऱीका के लिए पुर्तगाली भाषा में प्रसारण, मैसेडोनियाई और अल्बानियाई और सर्बियाई सेवाएँ बंद कर दी जाएंगी.

इनके अलावा मैडरिन, तुर्की, रूसी, यूक्रेनी, स्पेनिश, अज़ेरी और वियतनामी भाषा के रेडियो प्रसारण बंद हो जाएंगे.

जो शॉर्टवेव प्रसारण बंद होंगे वे हैं- हिंदी, इंडोनिशयाई, स्वाहिली, नेपाली, किर्गिस और ग्रेट लेक्स के इलाक़े में हो रहे प्रसारण.

फ़ारसी भाषा के शाम के रेडियो प्रसारण भी बंद किए जा रहे हैं. साथ ही अंग्रेजी भाषा के कुछ कार्यक्रम भी बंद किए जा रहे हैं.



भारी कटौती

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के इस फ़ैसले के तहत आनेवाले तीन वर्षों में 650 नौकरियां खत्म हो जाएंगी.

ये संख्या वर्ल्ड सर्विस के कुल मौजूदा कर्मचारियों की संख्या की एक चौथाई है.


नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने इन कटौतियों का विरोध किया है

बीबीसी के मुताबिक इस फ़ैसले से वर्ल्ड सर्विस सुननेवाले श्रोताओं की कुल संख्या एक हफ्ते में 18 करोड़ से घटकर 15 करोड़ रह जाएगी यानि श्रोताओं की संख्या में तीन करोड़ की कमी आएगी.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व प्रमुख सर जॉन तूसा के मुताबिक मौजूदा फैसले श्रोताओं, ब्रिटेन की विदेश नीति और खुद वर्ल्ड सर्विस के लिए के लिए बेहद दुखद हैं.

ब्रिटेन की नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने इन घोषणा पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

यूनियन के नेता जर्मी डीयर ने कहा है कि ऐसी प्रसारण सेवा जिस पर ब्रिटेन को गर्व है, उसको नष्ट करने से पत्रकारों और बीबीसी के कर्मचारियों का नाराज़ होना जायज़ है.

ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग इन कटौतियों को उचित ठहराया है.

ब्रितानी संसद में उन्होंने कहा कि वर्ल्ड सर्विस जितना संभव हो उतनी कार्यकुशलता से चलनी चाहिए और उसकी प्राथमिकताएँ नए बाज़ार, ऑनलाइन और मोबाइल बाज़ार हैं

Wednesday, January 26, 2011

संसद में पेश होने वाले आम बजट को लेकर कवायद शुरू


· सरकार और जनता दोनों के लिए ख़ास होगा बजट 2011-12

· सरकार के लिए इस बार का आम बजट तैयार करना काफी चुनौती भरा काम

नई दिल्ली, अंकुर शुक्ला

र बार की तरह इस बार भी संसद में पेश होने वाले आम बजट को लेकर कवायद शुरू हो चुकी है । ऐसा माना जा रहा है कि इस बार का बजट सरकार और जनता दोनों के लिए ख़ास होगा । दरअसल सरकार के लिए इस बार का आम बजट तैयार करना काफी चुनौती भरा है । एक तरफ महंगाई डायन बन कर लोगों की जेब पर भारी पड़ रही है । दूसरी ओर आम लोगों की उम्मीदें हैं और साथ ही सरकारी खजाने का भी ख्याल रखना है। सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से दबाव में है । वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी आर्थिक मामलों के भी वे अच्छे जानकार माने जाते हैं । चूकि उन्होंने कई मौकों पर यु.पी.ए सरकार का बेडा पार लगाया है और सरकार के लिए कई मौकों पर संकटमोचक भी साबित हुए है । इसलिए.उन्हे साल 2010 के सबसे बेहतर एशियाई वित्तमंत्री के अवार्ड से भी नवाजा गया। इससे पहले भी 1984 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्हें उस साल का दुनिया का सर्वश्रेष्ठ वित्तमंत्री चुना गया था।

बेहद ख़ास कैसे है यह बजट?

दरअसल प्रणव मुखर्जी के सामने ज्यादा मुश्किलें मुह बाए खड़ी है । देश की जनता करीब डेढ़ सालों से महंगाई की मार से बेहद परेशान है और इससे निजात दिलाने के लिए कोई ठोस सरकारी कदम के तौर पर अबतक कुछ भी सामने नहीं आया है । बीते 25 दिसंबर को खत्म हुए हफ्ते में महंगाई का ग्राफ भी 18 फीसदी के आंकड़े को पार कर चुकी है । ऐसे में जनता की यह उम्मीद रहेगी कि कम से कम आम बजट में वित्त-मंत्री की तरफ से आम लोगों पर कोई नया बोझ नहीं डाला जाएगा। डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स के मामले में भी सरकार के पास ज्यादा विकल्प नहीं है । इन करों की नई व्यवस्था में प्रस्तावित टैक्स दरों का ऐलान पहले ही नए डायरेक्ट टैक्स कोड में किया जा चुका है। साथ ही आयकर की सीमा को भी पहले ही बढ़ाकर 2 लाख रुपए तक किए जाने का प्रस्ताव निर्णय हो चुका है।

कैसे बढेगा जीडीपी अनुपात ?

देश जिन आर्थिक हालातों से गुजऱ रहा है उसे देखते हुए यह उम्मीद लगाईं जा रही है कि आम लोगों के लिए वित्तवर्ष 2011-12 का बजट राहत भरा ही होगा। जानकारों का तो यही मानना है कि सरकारी खजाने को भरने के लिए अगले वित्तवर्ष में अंतरराष्ट्रीय कराधान नियमों पर ध्यान देने की गुंजाइश ही बचती है। सरकार के सामने अपने टैक्स-जीडीपी अनुपात को बढ़ाने की भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में ट्रांसफर प्राइसिंग और दोहरे कराधान निवारण नियमों में बदलाव किए जा सकते हैं। माना यह भी जा रहा है कि सरकार आयात ड्यूटी में फेरबदल कर सकती है।

वैसे चालू वित्तवर्ष के दौरान कर उगाही में हुए इजाफे और जीडीपी के अच्छे आंकड़ों की बदौलत इस मामले में सरकार के लिए राहत की खबर है। इसके साथ ही सरकार को उम्मीद थी कि 3जी स्पेक्ट्रम की निलामी और सरकारी कंपनियों के विनिवेश के जरिए भी इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। लेकिन सरकारी तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे बीच यह फॉर्मूला कितना कारगर साबित हुआ यह भी सरकार को बताना होगा।

अब तक सरकारी कंपनियों के विनिवेश के जरिए 22,000 करोड़ रुपये की रकम जुटाई गई है जो की लक्ष्य से करीब करीब आधी ही है। यानी नए बजट की नई चुनौतियों के अलावा सरकार के पास अधूरे कामों को पूरा करने की भी चुनौती रहेगी।

जहां तक राजस्व में बढ़ोतरी का सवाल है, इस मोर्चे पर सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। कारण यह है कि सरकार पहले से ही डीटीसी (डायरेक्ट टैक्स कोड) विधेयक में नए टैक्स स्लैबों की पेशकश कर चुकी है। फिलहाल यह विधेयक संसद की स्थायी समिति के विचाराधीन है। पिछले साल पेश किए गए इस विधेयक में 2-5 लाख रुपये की आय पर 10 फीसदी टैक्स, 5-10 लाख रुपये की आय पर 20 फीसदी टैक्स और 10 लाख रुपये से ज्यादा की आय पर 30 फीसदी टैक्स लगाने का प्रस्ताव किया गया है। डीटीसी एक्ट के 1 अप्रैल 2012 से प्रभावी होने की संभावना है।

पिछले आम बजट के दौरान वित्तमंत्री ने यह कहा था कि सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2009-10 के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में 6.7 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2010-11 में घटकर जीडीपी के 5.5 फीसदी के बराबर पहुंच जाएगा। इस मोर्च पर भी सरकार को लेखा जोखा पेश करना होगा। पिछले बजट के पक्ष में तर्क पेश करना भी वित्तमंभत्री के लिए एक और बड़ी चुनौती होगी

बहरहाल आने वाले कुछ हफ्ते प्रणब दा के साथ ही उनके विभाग के अधिकारियों के लिए भी काफी चुनौती भरे रहने वाले हैं। अब देखना होगा कि आम लोगों को राहत और सरकारी खजाने का खयाल रखने के बीच वित्तमंत्री कैसे तालमेल बैठाते हैं।

इन्फ्रास्ट्रक्चर पर रहेगी नजऱ

इसबार बजट में सरकार की नजऱ खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर होगी.... बजट पेश करने के दौरान सरकार देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र को गति प्रदान करने के लिए बांड भी जारी करने के मूड में है...देश में बढाती हुई महंगाई के बीच सरकार की नजऱ लोगों की बचत पर है जिसका इस्तेमाल वह बेहद कुशलता से करना चाहती है....यह बेहद अच्छी तरह समझा जा सकता है कि इस क्षेत्र के अंतर्गत लगाने वाले टैक्स में छूट देकर सरकार पूंजी आकर्षित करना चाहती है।

रिजर्व बैंक के अधिकारी इस बात को लेकर अभी से ठोस रणनीति बनाने में जुट गए है ताकी कोई आकर्षक उपाए निकाला जा सके जिससे लोग टैक्स बचत के नाम पर पैसे वहां लगाएं। योजना आयोग ने अफसरों की इस समिति को कहा है कि वह इस दिशा में अपने प्रयास तेज करे। समिति की रिपोर्ट प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री के पास जाएगी और फिर यह बजट का हिस्सा बनेगी। समिति चाहती है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर में पैसे लगाने वालों को उसी तरह की छूट मिले जैसी विदेशों में मिलती है।

सरकार इस पक्ष में है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए आवश्यक धन देश से ही जुटाया जाए। विदेशों से फाइनेंस के वह पक्ष में नहीं है। अगले पांच सालों में सरकार को भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं के लिए कम से कम 45 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है जिसका बड़ा हिस्सा देश से आ सकता है और सरकार इसी योजना पर काम कर रही है।

किस तरह से इन बांडों में पैसा लगाने वालों को छूट देते हुए टैक्स वसूली के टारगेट को बरकरार रखा जाए समिति इस बात पर भी विचार कर रही है।टैक्स में ज्यादा छूट देने से यह उद्देश्य धरा रह जाएगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर समय की जरूरत है और सरकार इस पर पूरा ज़ोर देगी।

कन्या गुरुकुल विद्यालय, नरेला लड़कियों को ब्रह्मचर्य धारण की प्रेरणा देता विद्यालय



अंकुर शुक्ला
नई दिल्ली ,15 जनवरी। राजधानी दिल्ली में यूँ तो कई विद्यालय हैं जहां आधुनिक और विषयों से सम्बंधित शिक्षा दी जाती है । लेकिन दिल्ली के नरेला इलाके में स्थित कन्या गुरुकुल विद्यालय एकमात्र ऐसा विद्यालय है ,जहां संस्कृत की शिक्षा के साथ-साथ लड़कियों को ब्रह्मचर्य धारण करने की प्रेरणा भी दी जाती है । इस विद्यालय की स्थापना 1953 में नरेला के प्रकांड विद्वान स्वामी ओमानंद सरस्वती ने की थी । उन्होंने विद्यालय की स्थापना के लिए 62 एकड़ जमीन दान में दिया था ।

यहाँ संस्कृत में आचार्य ,शस्त्री,विशारद की उपाधि देकर अष्टाध्याय ,महाभाषी, वेद आदि की शिक्षा दी जाती है । पिछले 42 वर्षों के दौरान लगभग 15 हजार लड़कियों ने शिक्षा अर्जित की है । इनमे सैंकड़ो महिलायें विदेशी थी । इनमे से कई महिलाओं ने 'ब्रह्मचर्य पर्व' धारण कर आजन्म अविवाहित रहने का संकल्प किया है ।

हरियाणा के रोहतक स्थित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त कन्या गुरुकुल विद्यालय में अभी करीब 500 लड़किया हैं. और 20 शिक्षिकाएं हैं । यहाँ शिक्षा लेने या अध्यापिका के रूप में नियुक्ति के लिए पहली अनिवार्य शर्त न केवल अविवाहित होना बल्कि आजन्म अविवाहित होना भी जरूरी है । यहाँ वैदिक रीति से प्राचीन काल के गुरुकुलों की तरह शिक्षा दी जाती है ।


विद्यालय के नियमों के अनुसार सभी छात्राओं को प्रात: 4 बजे जगाना होता है । पांच बजे तक तैयार होकर पूजा स्थल पर वीड पाठ करना अनिवार्य है । प्रात: छह से आठ के बीच व्यायाम ,अल्पहार,कृषि एवं श्रमदान किया जाता है । 10 बजे विद्यालय में पढाई होती है । अपराहन तीन बजे विद्यालय सत्र समाप्त होता है । तुरंत अल्पहार एवं विश्राम के बाद विद्यालय परिसर की गतिविधियाँ ख़त्म हो जाती है ।

अपनी कुशलता के लिए यह गुरुकुल अन्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्द है । नेपाल,मारीशस आदि देशों से प्राय: छात्राएं यहाँ शिक्षा लेने आया करती है । इसके अलावा दक्षिण भारत से भी यहाँ छात्राएं पढऩे आती हैं । लड़कियों के लिए यहाँ भोजन,वस्त्र आदि सभी सुविधाएं नि:शुल्क प्रदान की जाती है । .गुरुकुल की 50 एकड़ जमीन में खेती होती है और जनसहयोग से ही इसका संचालन होता है । गुरुकुल की अपनी गौशाला भी है,जिसमे करीब 80 गायें हैं ।

एक विदेशी छात्रा ने बताया की शांत ,सौम्य और पुर्णत: भारतीय माहौल के अनुकूल यह गुरुकुल एक विलक्षण संस्थान है ,जहां शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ भारत के सांस्कृतिक और पौराणिक दर्शन को जानने का मौका मिलाता है । एक सवाल के ज़बाव में सुनीता ने कहा कि ऐसा नहीं है कि संस्कृत की शिक्षा से रोजग़ार नहीं मिल सकता,यहाँ की शिक्षा से तो समाज,इतिहास और भारत के प्रति नै दृष्टि मिली है ,जो मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है । नेपाल की तुलसी का स्पष्ट मानना है कि संस्कृत का भविष्य उज्जवल है और मै संस्कृत की प्रकांड विद्वान बनने की ललक से यहाँ पढ़ रही हूँ । अविवाहित रहने के बावत विदेशी लड़कियों का कहना है कि यहाँ की ऐसी दिनचर्या है,जिससे हमलोगों को समाज के लिए कुछ नया करने की प्रेरणा मिली है ।

अधिकाँश शिक्षिकाएं भी अविवाहित रहकर यहाँ के माहौल से तृप्त हैं । इनके अनुसार यह सभी अविवाहित रहकर केवल नौकरी नहीं कर रही है बल्कि अपनी पौराणिक संस्कृति की रक्षा कर रही हैं । यह कर्तव्य से बढक़र नैतिक धर्म है जिसके लिए संसारिकता के मोहपाश से अलग रहना त्याग नहीं स्वेक्छा है । यहाँ की अधिकाँश लड़कियों ने भी उम्र भर अविवाहित रहने का संकल्प लिया है ।

दरअसल यह गुरुकुल एक संस्था न होकर पौराणिक भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की रक्षा करने वाली तपोभूमि है । एक तरफ नरेला में कन्याओं की तपस्या हो रही है वही दूसरी ओर हरियाणा के झज्जर में युवाओं को भी शिक्षित किया जा रहा है । स्थानीय लोगों का यह मानना है कि इस गुरुकुल में कन्याओं को समाज की मुख्य धारा से अलग नहीं किया जा रहा है बल्कि मुख्य धारा में रखते हुए उन्हें विलक्षण बनाने का प्रयास किया जा रहा है ।

देश भर में आयोजित होने वाले संस्कृत के तकरीबन सभी प्रतियोगिताओं में अब-तक सभी पुरस्कार यहाँ पढऩे वाली लड़कियों ने ही जीता है । संस्कृत अकादमी द्वारा विशिष्ट तौर पर पुरस्कृत यह गुरुकुल भले ही आज के आधुनिक समाज में सर्वमान्य न हो ,मगर पौराणिक संस्कृति ,परंपरा और भाषाओं की जननी संस्कृत की सेवा करने वाले कन्या गुरुकुल के महत्वा को नकारा नहीं जा सकता है ।

लाइफ लाइन बनी मुसीबतों की लाइन


· मेट्रो के परिचालन में आई फिर तकऩीकी खïराबी

· नाराज़ यात्रियों का हंगामा

· मेट्रो प्रबंधन और दिल्ली सरकार के खिलाफ नारेबाजी

लक्ष्मीनगर, अंकुर शुक्ला

अगर मेट्रो इस्तेमाल करते हैं तो निश्चित समय से पहले घर से निकलना होगा । चौकिये मत! आज - कल दिल्ली मेट्रो के परिचालन में जितनी रुकावटें आ रही है उसे देखकर ऐसा ही लगता है।

सोमवार (17 जनवरी) को पीक आवर के दौरान नोएडा- द्वारका और आनंद विहार रूट में अचानक आई तकऩीकी गड़बड़ी से यात्रियों को काफी परेशान होना पड़ा । अपने निर्धारित समय तीन मिनट के अंतराल पर चलने के बजाय मेट्रो पच्चीस मिनट के अंतराल पर चल रही थी । जिसके कारण सभी स्टेशनों पर यात्रियों की भारी भीड़ इक_ी हो गई और अफरातफरी का माहौल बन गया । मेट्रो के देर से आने की एक बड़ी वजह भारी संख्या में इक_ी यात्रियों की भीड़ को भी माना जा रहा है । ठसाठस यात्रियों से भरी मेट्रो के गेट को बंद करने में काफी दिक्कत हो रही थी और सभी स्टेशनों पर मेट्रो को ज्यादा समय तक रोकना पड़ रहा था ।

इस दौरान लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन पर मेट्रो प्रबंधन से नाराज़ यात्रीयों ने जमकर हंगामा मचाया और दिल्ली मेट्रो एवं दिल्ली सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की । दरअसल यात्रा में हो रही देरी से परेशान यात्रीयों ने जब अपना टिकट वापस करना चाहा तो स्टेशन प्रबंधन ने टिकट वापस करने से साफ़ इनकार कर दिया और यह घोषणा कर दी कि "जाने वाले यात्री अपना टोकन जमा कराकर जा सकते है लेकिन टोकन का मूल्य वापस नहीं किया जाएगा" जो दिल्ली मेट्रो प्रबंधन का तानाशाही चेहरे को उजागर करता है ।

लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन के ग्राहक सेवा अधिकारी सुमित सुमन के अनुसार लिंक फेल होना और पीक आवर में यात्रियों की भारी भीड़ का होना परिचालन में व्यवधान की एक बड़ी वजह है । मेट्रो में चढऩे-उतरने के दौरान यात्री मेट्रो के गेट को बंद होने में व्यवधान डालते है जिससे अक्सर मेट्रो अपने निश्चित समय से देर पहुचती है और दुसरे यात्रियों को परेशान होना पड़ता है । उन्होंने यह भरोसा दिलाया है कि दिक्कतों को जल्द ही दूर किया जाएगा। वहीं स्टेशन नियंत्रक विजेंद्र पाल सिंह ने इस सम्बन्ध में टिपण्णी करने से इनकार कर दिया।

गौरतलब है कि पिछले कई महीनो से मेट्रो परिचालन म ें दिक्कतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है । जिसे अभी तक दुरुस्त नहीं किया जा सका है । आए दिन किसी न किसी रूट में तकनीकी खराबी आने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है । जिससे मेट्रो के परिचालन और प्रबंधन में व्याप्त बदइन्तजामी और लापरवाहियों का पता चलता है और मेट्रो प्रशासन इसे लेकर गंभीर नहीं लगता है । मालूम हो कि 23 दिसंबर से द्वारका नोएडा और द्वारका आनंदविहार रूट पर पीक आवर के दौरान छ: बोगी वाली दो अतिरिक्त ट्रेने चलाई जा रही है । लेकिन बढती हुई भीड़ के सामने यह प्रयास भी नाकाफी रहा है । दिल्ली मेट्रो ने यह भरोसा दिलाया है कि इस वर्ष के अंत तक सभी रूटों पर नई ट्रेनों को शामिल किया जाएगा जिनमे छ: बोगी वाले ट्रेन भी होंगे I

दिल्ली मेट्रो से विभिन्न रूटों पर रोजाना लगभग १६ लाख यात्री सफऱ करते हैं जिनकी संख्या आगे चलकर 1.25 करोड़ होने का अनुमान है I जैसे-जैसे मेट्रो का विस्तार हो रहा है, लोगों की उम्मीदें भी बढती जा रही है अब आने वाले वकत में डी एम आर सी दिल्ली वासियों की आशाओं पर कितना खड़ा उतरता है यह तो वक्त ही बताएगा I