Showing posts with label VIVID. Show all posts
Showing posts with label VIVID. Show all posts

Thursday, February 10, 2011

अपनी भूमि पर लोकप्रियता के लिए संघर्षशील “भारतीय शास्त्रीय संगीत”(भाग-2)

लाकारों को हमारे समाज में प्रतिष्ठा एवं प्रसिद्धि प्राप्त है.ज्यादातर कलाकार आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी सबल हैं.अपने व्यक्तिगत या लाभ-पूर्ण मांगों केलिए वह भारत सरकार से निवेदन करते हैं,इन कलाकारों की प्रतिष्ठा,प्रसिद्धि और देश के लिए किये गए उनके योगदान को देखते हुए सरकार चाहकर भी नजरंदाज नही करती है,
तो क्या इस गंभीर सांस्कृतिक संकट के समाधान हेतु ऐसे प्रतिष्ठित कलाकार एकजुट होकर और एक मंच पर आकर आवाज़ उठाएंगे तो क्या? सरकार नींद से नही जागेगी?
rudravina
विदेशों में प्रतिष्ठा और कद्रदानो के नाम पर वहाँ की नागरिकता प्राप्त करने के बजाये अगर, हमारे प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्द कला प्रतिनिधि इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाये तभी स्थिति में सुधार संभव हो पायेगा. इलेक्ट्रोनिक मीडिया और सुचना-क्रांति के युग में क्या कोई ऐसा कलाकार नही है जो,आर्थिक रूप से इतना सबल हो और ऐसे कार्यक्रमों के प्रसारण के लिए एक टी.वी.(उपग्रह) चैनल का आरम्भ करने की कोशिश करे!!अथवा अपना सहयोग दे सके!!
शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में जाने के नाम पर लोग अक्सर यह कहते हैं कि, “इनका कार्यक्रम बहुत लम्बी अवधि का होता है…..हमारे पास समय का बहुत आभाव होता है……हमें इस प्रकार का कार्यक्रम समझ में नही आता है……….ये कार्यक्रम संगीत से सम्बंधित एवं बुज़ुर्ग व्यक्तियों के लिए होता है……… मेरे एक मित्र ने कहा कि ‘ऐसे कार्यक्रम अरूचिकर होते हैं………मुझे पसंद नही आता………चूँकि इसे वृद्ध कलाकार प्रदर्शित करते हैं ,इसलिए ऐसे कार्यक्रम वृद्धों के लिए अच्छा होता है……वगैरह!!वगैरह!!
अरे!! भाई!! जबतक कार्यक्रम में बैठोगे नही,सुनोगे नही तो भला!! इसे सुनने कि रुचि खान उत्पन्न होगी? बिना देखे-सुने केवल दूसरों के मात्र कह्देने से किसी कला के प्रदर्शन पर नकारात्मक और एकतरफा अवधारणा बना लेना कहाँ कि बुद्धिमानी है?? जाकर कार्यक्रम कि प्रस्तुति देखने पर पता चलेगा कि, ऐसे कार्यक्रमों में युवा वर्ग कि उपस्थिति होती है या नही??

हो सकता है! कि आपके मित्र को जो पसंद नही आया वह आपको पसंद हो!

संगीत कला एक कठिन कला है जिसे सीखते हुए इंसान को अपनी उम्र का पता ही नहीं चलता कि वह कब वृद्ध हो गया?वैसे भारतीय शास्त्रीय संगीत में युवा वर्ग से कई प्रसिद्द युवा कलाकार भी हैं.किसी चीज़ को नजदीक से देखने या मह्शूश करने के बाद ही उस पर सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणी करना न्यायोचित रहता है!

हममे से कई लोगों को अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान नही होता फिर भी हम अंग्रेजी भाषा के गानों के धुनों पर थिरकने लगते है!भारतीय शास्त्रीय संगीत तो फिर भी अपने देश कि और अपने ही भाषा में है,जिसमे यकायक तूफ़ान आकर सबकुछ तहस-नहस नही करता बल्कि,धीरे -धीरे सुरों की लहरें आपको कर्णप्रियता और मधुरता के भवर में डुबो कर मनोरंजन की चरम-सीमा तक ले जाती है. विदेशों में या विदेशों से हमारे देश में आये हुए दर्शक जब बिना भाषा ज्ञान के केवल हमारे संगीत की धुन पर थिरक सकते हैं तो हम क्यों नही??

देखा जाए तो उठने से सोने तक हम विदेशियों की नक़ल करने में व्यस्त रहते हैं,तो इन कार्यक्रमों को देखने में भी इन्ही के नक़्शे-कदम पर चलने में भला हर्ज़ ही क्या है??

भारतीय शास्त्रीय संगीत को सुनने से होने वाले फायदों का लोहा विज्ञान और वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है. यहाँ तक कि,भारत और विदेशों में इसकी मदद से कई चिकित्सा-पद्धतियों को भी विकसित किया जा चुका है, जिनकी मदद से आज कई असाध्य रोगों का उपचार संभव हो गया है.

आप वैज्ञानिक युग में जीवन जी रहे हो तो कम से कम विज्ञान को तो मानो!!


इससे पहले कि अँधेरा हो जाए, सूरज बादल में छुप जाये,
चिड़ियों का चहकना रूक जाए, तेरा कोई अपना खो जाए,
तू ही संकट में फंस जाए, विलुप्त कला सब हो जाए,
संगीत के धुन में रम जाओ, आओ सुब मिल मन से गाओ!!

” अगर हम अपनी राष्ट्रिय संस्कृति,धरोहरों और कलाओं का सम्मान नही करेंगे तो हमारी आने वाली पीढियां इसके दर्शन-मात्र को तरस जायेगी और हम सबसे यह सवाल करेगी कि, ‘आप (यानि हम) इतने लापरवाह और गैरजिम्मेदार थे,जो अपने अनमोल सांस्कृतिक धरोहरों को हमारे लिये संभाल न सके??

जरा सोंचिये,क्या ज़बाब देंगे आप उनको और स्वयं को “……………………………???

Saturday, February 5, 2011

अपनी भूमि पर लोकप्रियता के लिए संघर्षशील “भारतीय शास्त्रीय संगीत”(भाग-१)


Presented by : ANKUR SHUKLA

विश्व मानष पटल पर हिन्दुस्तान अपनी बहुआयामी सांस्कृतिक विविधता,धर्मनिरपेक्षता,नम्यता और अनम्यता के अनोखे समिश्रण एवं अपनी कला और प्रतिभाओं के लिए प्रसिद्द है.आज संपूर्ण विश्व भारतीय प्रतिभाओं एवं भारतीय कला का कायल बन चुका है. विज्ञान,दर्शन,संचार,वाणिज्य,व्यवसाय,सूचना एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिन्दुस्तान अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है.

भूमंडलीकरण एवं वैश्वीकरण के प्रभाव से वर्तमान दौड़ में अन्य देशों की तरह भारत प्रभावित हुआ है. जिसके परिणामस्वरुप भारतीय संस्कृति और उससे जुडी जीवनशैली काफी हद तक प्रभावित हुई है.अनेक क्षेत्रों में व्यापक रूप से इसके सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं साथ ही सIथ कई देशों को अपने कुछ क्षेत्रों में व्यापक बदलाव की वजह से इसके दुष्परिणामों से भी रू-ब-रू होना पर रहा है.

भारत में संगीतनृत्य,गायन-वादन की ललित कलाओं के रूप में अपनी एक विशिष्ठ पहचान है.विद्वानों के मतानुसार यह राष्ट्र ‘विश्वस्तर’ पर इन कलाओं प्रतिनिधित्व आदि काल से करता आ रहा है. संगीत को हमारे देश में ‘शास्त्र’ के रूप में जाना जाता है. कलाकारों द्वारा अपने कल्पनाशीलता के माध्यम से हिन्दुस्तानी संगीत का प्रस्तुतीकरण मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है.जानने योग्य बात यह है कि, भारतीय शास्त्रीय संगीत ही एक मात्र ऐसी संगीत है, जिसका आधार कलाकार की कल्पनाशीलता पर निर्भर करता है.विश्व में उपलब्ध अन्य संगीत शैलियाँ एवं उनके प्रस्तुतीकरण का आधार प्रदर्शन से पहले तय किया जाता है.

मगर, “दुःख की बात यह है कि, आज भारतीय शास्त्रीय संगीत हमारे बीच दिन-प्रतिदिन अपनी लोकप्रियता खोती जा रही है.आधुनिक जीवन शैली एवं अन्य देशों कि चकाचौध भरी संस्कृतियों और तरीकों को अपनाने के होड़ में इस विश्व प्रसिद्द कला को समय देने वाले अब नाम मात्र लोग ही सक्रीय दिखते हैं”.हालाँकि,भारतीय शास्त्रीय संगीत के कुछ प्रतिनिधि कलाकार आदि इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं.मगर, यह कहा जाए कि यह सांस्कृतिक धरोहर अपने संकटकालीन दौड़ से गुज़र रही है तो,शायद यह गलत नही होगा. गंभीर सांस्कृतिक संकट से जूझती हमारी यह ललित कला खासकर युवा वर्ग कि उपेक्षा से ग्रस्त है.

गौरतलब है कि, इस सांस्कृतिक धरोहर को संकटकालीन स्थिति से उबारने के लिए देश कि कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा समय-समय पर अनेक प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों से कोई सकारात्मक परिणाम सामने आता हुआ नही दिख रहा है.

जहां एकतरफ हमारे ही देश में हमारी यह सांस्कृतिक विरासत लोकप्रियता के लिए संघर्ष कर रही है, वही विदेशों में हमारी यह अन्मूल कला काफी लोकप्रिय और कर्णप्रिय है.परिणामस्वरूप देश के प्रसिद्द कलाकार उचित मंच के आभाव में अन्य देशों कि ओर बसने को मजबूर हैं.अगर संगीत के विद्यार्थियों के दृष्टिकोण से देखें तो इस विषय में ‘मानक-उपाधि’ प्राप्त छात्र एवं छात्राए रोज़गार के लिए तरश रहे हैं. कुछ प्रतिभाशील कलाकार दिन-प्रतिदिन होती उपेक्षा ओर उचित मंच के आभाव में बदहाली ओर संकटग्रस्त जीवन जीने को या फिर,जीविकोपार्जन हेतु किसी अन्य साधन को अपनाने के लिए मजबूर हैं.

सवाल यह है कि,’ऐसी परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है’ ?
सरकार,कलाकार,अध्यापक या स्वयं हम?देखा जाये तो, इस मामले में सरकार की उदासीनता भी इस गंभीर सांस्कृतिक संकट को बढ़ावा दे रही है जिसके परिणामस्वरूप,केवल यह ललित कला ही नही बल्कि,कई राष्ट्रिय गौरव से जुडी हुई सांस्कृतिक विरासत खतरे में है.वर्तमान में चल रहा ‘हॉकी(राष्ट्रिय खेल) विवाद’ इसका जीवंत उदहारण है.

अक्सर,कलाकार (प्रसिद्द कलाकार) इस बात को लेकर सरकार से असंतुष्ट रहते हैं कि,ललित कलाओं कि बेहतरी के लिए सरकार के द्वारा कोई सहयोग प्राप्त नही होता है.इसके प्रदर्शन हेतु राष्ट्रीय चॅनल पर जो समय निर्धारित किया गया है,उस वक़्त अधिकांश लोग सो गए होते हैं. इन कार्यक्रमों के प्रसारण हेतु जो समय निर्धारित है वह या तो मध्य रात्री में है या फिर! प्रातः काल में.

अब भला दिनभर के व्यस्ततम एवं आपा-धापी भरे जीवन में भला कौन दर्शक होगा जो,इन कार्यक्रमों को देखने या सुनने केलिए आराम से समझौता करेगा!! ऐसे समय निर्धारण से इन मामलों में भारत सरकार कि लापरवाही एवं उदासीनता को स्वयं ही समझा जा सकता है.

अगर शिक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाये तो देश भर के गिने-चुने स्तर के कुछ विश्वविद्यालयों में ही संगीत एवं अन्य ललित कलाओं की शिक्षा दी जाती है,जिन में से अधिकांश विश्वविद्यालयों द्वारा इन विषयों में रोज़गार देना तो दूर की बात है,ऐसे विश्वविद्यालय प्रतिभाशाली कलाकारों के निर्माण में भी अक्षम साबित हो रहे हैं.इन विषयों से जुड़े विद्यार्थी केवल अपनी ‘डिग्री की पिपासा’को शांत करने के लिए इस उम्मीद के कारण प्रवेश लेते हैं कि,इन विषयों से सम्बंधित ‘उपाधि’ होने पर अगर भाग्य ने साथ तो इन्हें व्याख्याता या आखरी उम्मीद के रूप में संगीत शिक्षक बनने का मौका मिल जाएगा.

अन्य क्षेत्रों कि अपेक्षा इन क्षेत्रों आज भी रोज़गार का आभाव है.यह बात अलग है कि जितनी मेहनत विद्यार्थियों को वैज्ञानिक,डॉक्टर,इंजीनियर बनने में करनी होती है, संगीत और ललित कलाओं में भी उतनी ही मेहनत कि जरूरत होती है, या शायद अन्य क्षेत्रों से कही अधिक!! इस लिए ललित कलाओं के क्षेत्र में रोज़गार कि सम्भावना कम होने कि वजह से भला!कौन सा पिता या अभिभावक यह चाहेगा कि उसकी संतान इन क्षेत्रों को अपनाए??
किसी भी विषय कि अच्छी शिक्षा उस विषय के अध्यापक कि ‘विषय-विशेष’ में उसकी निपुणता और उस विषय में उसकी कुशलता पर निर्भर करता है.अनेक संगीत के विद्वानों और प्रसिद्द मंच कलाकारों कि माने तो “एक कलाकार को मंच प्रशिक्षण देने के लिए अद्यापक का स्वयं एक कुशल मंच कलाकार होना आवश्यक होता है”तभी अद्यापक अपने शिष्य को सफल मंच कलाकार बना सकता है.

सोंचने कि बात यह है, कि “अगर अद्यापक स्वयं कला-प्रदर्शन में सक्षम नही है तो,वह किसी विद्यार्थी से मंच-प्रदर्शन योग्य भला कैसे बना सकता है??और संगीत जैसे व्यवहारिक और प्रदर्शन आधारित विषय में वह विद्यार्थी सफलता कैसे प्राप्त करेंगे? अब वही विद्यार्थी अपनी उपाधि के बल पर शिक्षण कार्य करते हुए क्या विद्यार्थियों को संगीत कि उचित शिक्षा देने में सक्षम हो सकते है”? यह अपने आप में एक गंभीर प्रश्न है! ‘विश्वविद्यालयों में ऐसे कितने अद्यापक हैं जो स्वयं मंच एवं कला-प्रदर्शन में सक्षम हैं?इनकी संख्या का स्वयं ही अनुमान लगा लीजिये’!
To be continued............................

Saturday, January 29, 2011

सुर ही ईश्वर है: डॉ आदेशरा



  • नेत्र हीनता नही है बाधक क्योंकि संगीत एक एहसास है
  • गरीब छात्रों को शिक्षित कर संतुष्टïी मिलती है



फलता उनकी ही कदम चूमती है जिनमें मंजिल पाने की ललक हो। ऐसे लोगों के इरादे चट्टानों से भी मजबूत होते हंै, जिन्हें उनकेे लक्ष्य से कोई डिगा नही सकता और जिन्हें विजय पाने की आदत हो जाती है। ऐसे लोग प्रत्येक कठिनाइयो को चुनौती मानते हंै और जिंदगी की राह में आत्मविश्वास के साथ उनके बढते कदम असफलता को बहुत पीछे छोड़ देते हंै। ऐसे लोग बन जाते हंै मिसाल समाज के लिए।


उत्तरी दिल्ली के अशोक विहार में रहने वाले सुप्रसिद्व सितार वादक और दिल्ली विश्वविघालय के रि़टायर्ड प्राघ्यापक डा० रवंींद्र आदेशरा उन चन्द लोगों में से एक हंै जिन्होंने कठिनाइयों को चुनौती मान कर उन पर विजय प्राप्त की है। नेत्रहीन होते हुए भी इन्होंने जिंदगी की वो इबारत लिखी है जो समाज के लिए एक बड़ा उदाहरण है और खास तौर से नेत्रहीन लोगों के लिए पे्ररणा का आघार भी ।

अंकुर शुक्ला ने डा० आदेशरा से लंबी बातचीत यहां पेश हंै उसके कुुछ संक्षिप्त अंश

  • आपने सितार वादन ही क्यों अपनाया ïसुना है आप गाते भी है?

* बचपन से ही सितार की आवाज पसंद है और तभी से सितार बजाने की ललक मन मे पैदा हो गई । सितार की आवाज में एक प्रकार की आत्मीयता है जो इसे सजीव बनाता है और यह मन को रोमांचित करने वाला वाद्य यंत्र है। सितार बजाने वाले महान संगीतज्ञो ंको सुनकर सितार बजाने की प्रेरणा मिली ।सितार वादन के साथ गायन में भी रूचि है, वैसे भी संगीत में गायन वादन और नृत्य इन तीनों कलाअंो में से गायन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

  • सितार वादन और कंठ संगीत की विधिवत शिक्षा किन लोगों से प्राप्त की ?

* सितार में विश्वविघालय स्तर पर पी एच डी करने के साथ मुझे गायन और सितार वादन की प्रारंभिक शिक्षा पंडित चंद्रकंात जी, गन्धर्व संगीत महाविघालय के पंडित अनिलधर जी और पद्मविभूषण पंडित देबु चौधरी से प्राप्त करने का सौभाग्य मिला ।
किन चुनौतियों का सामना करना पडा़?

* नेत्रहीनता मेरे लिए एक बडी चुनौती थी नेत्रहीन होने की वजह से सभी अध्यापक यह मानते थे कि मैं सितार नही सीख पाउंगा लेकिन मुझमे इसे सीखने को लेकर ग$जब का आत्मविश्वास और ललक थी । बस मैने अपने आप पर भरोसा किया और सीखने में सफल रहा । इसके अलावा मै तबला और प्राचीन वाद्य यंत्र दिलरूबा इसरारज भी बजाता हूं।

  • आप बदलाव के इस दौर में शास्त्रीय संगीत को कहंा पाते हंै ?

* शास्त्रीय संगीत की अपनी एक खास महत्ता और दर्शक दिर्धा है । संपूर्ण विश्व में शास्त्रीय संगीतही ऐसी संगीत पद्वति है जिसका प्रदर्शन कल्पना पर आधारित होता है । लोगो की रूचि और खास कर युवाओं के पसंद का ख्याल रखा जाना चाहिए। अन्य संगीत पद्वतियों से इसकी तुलना नही की जा सकती ।

  • आपको ऐसा नही लगता कि संगीत के क्षेत्र में कलाकारों के लिए मंच तो उपलब्ध है लेकिन विद्यार्थियों के लिए निश्चित रोजग़ार की कमी है?
* हां यह बात काफी हद तक सही है । इस क्षेत्र में रोजगार की अनिश्चितता तो है मगर स्कूल कालेजों और विश्वविधालयों में अध्यापकों और प्राध्यापकों के रूप में रोजगार प्राप्त की जा सकती है । इसके अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन में भी कलाकरों की नियुक्ति होती है ।

  • बतौर अध्यापक आप अपने को आज कहंा पाते हैं ?

* बतौर संगीत अध्यापक मैेने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षण कार्य को समर्पित कर दिया है विभिन्न विधियों के द्वाारा विद्याथर्र््िायों कों संगीत की शिक्षा देना पसंद है विशेष कर गरीब छात्रों को शिक्षित करना चाहता हँू।
ऐसे लोगो को शिक्षित कर बहुत संतुष्टïी मिलती है इसलिए सेवा निविृत होकर भी मैने यह कार्य जारी रखा है।

  • संगीत के विद्याथर््िायों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेगें?

* विद्यार्थी मेहनत और लगन से अपना लक्ष्य हासिल कर्रंे और अपने गुरूअंो के प्रति आस्था रख्ंो। संगीत के सुर एक छोटे बालक की तरह है जिससें जितना प्यार करोगे सुर तुम्हारे उतना ही करीब होगा।
_____________________________________________________________________


एक नजर
  • १९७२ से २००३ दिल्ली विश्वविद्यालय मे बतौर प्राध्यापक
  • वतमान मे अतिथी संकाय केेरूप मे कायॅरत
  • २५ सालो से आकाशवाणी कलाकार
उपलब्धियॉ
  • बेस् त मियुजिसियन अवार्ड
  • म्युजिकएन्ड लायनेन्त अवार्ड
  • नेश्नल कल्चरल सकॉलरशिप
मंच प्रदर्शन
  • मंगलवासरीय संगीत समारोह दिल्ली मुंम्बइ अहमदाबाद सहित भारत के विभिन्न स्थानो मे
  • आकाशवाणी और दूरदर्शन

Wednesday, January 26, 2011

कन्या गुरुकुल विद्यालय, नरेला लड़कियों को ब्रह्मचर्य धारण की प्रेरणा देता विद्यालय



अंकुर शुक्ला
नई दिल्ली ,15 जनवरी। राजधानी दिल्ली में यूँ तो कई विद्यालय हैं जहां आधुनिक और विषयों से सम्बंधित शिक्षा दी जाती है । लेकिन दिल्ली के नरेला इलाके में स्थित कन्या गुरुकुल विद्यालय एकमात्र ऐसा विद्यालय है ,जहां संस्कृत की शिक्षा के साथ-साथ लड़कियों को ब्रह्मचर्य धारण करने की प्रेरणा भी दी जाती है । इस विद्यालय की स्थापना 1953 में नरेला के प्रकांड विद्वान स्वामी ओमानंद सरस्वती ने की थी । उन्होंने विद्यालय की स्थापना के लिए 62 एकड़ जमीन दान में दिया था ।

यहाँ संस्कृत में आचार्य ,शस्त्री,विशारद की उपाधि देकर अष्टाध्याय ,महाभाषी, वेद आदि की शिक्षा दी जाती है । पिछले 42 वर्षों के दौरान लगभग 15 हजार लड़कियों ने शिक्षा अर्जित की है । इनमे सैंकड़ो महिलायें विदेशी थी । इनमे से कई महिलाओं ने 'ब्रह्मचर्य पर्व' धारण कर आजन्म अविवाहित रहने का संकल्प किया है ।

हरियाणा के रोहतक स्थित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त कन्या गुरुकुल विद्यालय में अभी करीब 500 लड़किया हैं. और 20 शिक्षिकाएं हैं । यहाँ शिक्षा लेने या अध्यापिका के रूप में नियुक्ति के लिए पहली अनिवार्य शर्त न केवल अविवाहित होना बल्कि आजन्म अविवाहित होना भी जरूरी है । यहाँ वैदिक रीति से प्राचीन काल के गुरुकुलों की तरह शिक्षा दी जाती है ।


विद्यालय के नियमों के अनुसार सभी छात्राओं को प्रात: 4 बजे जगाना होता है । पांच बजे तक तैयार होकर पूजा स्थल पर वीड पाठ करना अनिवार्य है । प्रात: छह से आठ के बीच व्यायाम ,अल्पहार,कृषि एवं श्रमदान किया जाता है । 10 बजे विद्यालय में पढाई होती है । अपराहन तीन बजे विद्यालय सत्र समाप्त होता है । तुरंत अल्पहार एवं विश्राम के बाद विद्यालय परिसर की गतिविधियाँ ख़त्म हो जाती है ।

अपनी कुशलता के लिए यह गुरुकुल अन्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्द है । नेपाल,मारीशस आदि देशों से प्राय: छात्राएं यहाँ शिक्षा लेने आया करती है । इसके अलावा दक्षिण भारत से भी यहाँ छात्राएं पढऩे आती हैं । लड़कियों के लिए यहाँ भोजन,वस्त्र आदि सभी सुविधाएं नि:शुल्क प्रदान की जाती है । .गुरुकुल की 50 एकड़ जमीन में खेती होती है और जनसहयोग से ही इसका संचालन होता है । गुरुकुल की अपनी गौशाला भी है,जिसमे करीब 80 गायें हैं ।

एक विदेशी छात्रा ने बताया की शांत ,सौम्य और पुर्णत: भारतीय माहौल के अनुकूल यह गुरुकुल एक विलक्षण संस्थान है ,जहां शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ भारत के सांस्कृतिक और पौराणिक दर्शन को जानने का मौका मिलाता है । एक सवाल के ज़बाव में सुनीता ने कहा कि ऐसा नहीं है कि संस्कृत की शिक्षा से रोजग़ार नहीं मिल सकता,यहाँ की शिक्षा से तो समाज,इतिहास और भारत के प्रति नै दृष्टि मिली है ,जो मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है । नेपाल की तुलसी का स्पष्ट मानना है कि संस्कृत का भविष्य उज्जवल है और मै संस्कृत की प्रकांड विद्वान बनने की ललक से यहाँ पढ़ रही हूँ । अविवाहित रहने के बावत विदेशी लड़कियों का कहना है कि यहाँ की ऐसी दिनचर्या है,जिससे हमलोगों को समाज के लिए कुछ नया करने की प्रेरणा मिली है ।

अधिकाँश शिक्षिकाएं भी अविवाहित रहकर यहाँ के माहौल से तृप्त हैं । इनके अनुसार यह सभी अविवाहित रहकर केवल नौकरी नहीं कर रही है बल्कि अपनी पौराणिक संस्कृति की रक्षा कर रही हैं । यह कर्तव्य से बढक़र नैतिक धर्म है जिसके लिए संसारिकता के मोहपाश से अलग रहना त्याग नहीं स्वेक्छा है । यहाँ की अधिकाँश लड़कियों ने भी उम्र भर अविवाहित रहने का संकल्प लिया है ।

दरअसल यह गुरुकुल एक संस्था न होकर पौराणिक भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की रक्षा करने वाली तपोभूमि है । एक तरफ नरेला में कन्याओं की तपस्या हो रही है वही दूसरी ओर हरियाणा के झज्जर में युवाओं को भी शिक्षित किया जा रहा है । स्थानीय लोगों का यह मानना है कि इस गुरुकुल में कन्याओं को समाज की मुख्य धारा से अलग नहीं किया जा रहा है बल्कि मुख्य धारा में रखते हुए उन्हें विलक्षण बनाने का प्रयास किया जा रहा है ।

देश भर में आयोजित होने वाले संस्कृत के तकरीबन सभी प्रतियोगिताओं में अब-तक सभी पुरस्कार यहाँ पढऩे वाली लड़कियों ने ही जीता है । संस्कृत अकादमी द्वारा विशिष्ट तौर पर पुरस्कृत यह गुरुकुल भले ही आज के आधुनिक समाज में सर्वमान्य न हो ,मगर पौराणिक संस्कृति ,परंपरा और भाषाओं की जननी संस्कृत की सेवा करने वाले कन्या गुरुकुल के महत्वा को नकारा नहीं जा सकता है ।